(आलेख : जैकब क्लिंट | अनुवाद : संजय पराते)
दैनिक रेवांचल टाइम्स — ऐसे समय में जब ओमान की मध्यस्थता में बातचीत चल रही थी, तब “ब्लू वॉटर्स” जो कभी आर्थिक खुशहाली और वैश्विक जुड़ाव का प्रतीक हुआ करते थे, आज धातुओं के कब्रिस्तान और संभावित बड़े युद्ध का मंच बनते जा रहे हैं। ईरान पर थोपा गया साम्राज्यवादी संघर्ष, जिसमें अमेरिका और इज़राइल की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, अब पश्चिम एशिया से आगे बढ़कर भारत के हितों और नागरिकों तक भी असर डाल रहा है।
इस उभरते संकट के केंद्र में भारतीय नाविक हैं — वे लोग जो वैश्विक व्यापार की रीढ़ हैं, लेकिन अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। आज वही नाविक लगातार हमलों और युद्ध जैसी परिस्थितियों के बीच काम करने को मजबूर हैं। रिपोर्टों के अनुसार वैश्विक व्यापार के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर काम करते हुए भारतीय नाविक सीधे खतरे की जद में आ चुके हैं।
हाल ही में ओमान की खाड़ी में पलाऊ ध्वज वाले तेल टैंकर स्काईलाइट पर हुए मिसाइल हमले ने इस संकट की भयावहता को उजागर कर दिया। जहाज के ब्रिज पर हुए इस हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए। यह घटना दिखाती है कि वैश्विक व्यापार को चलाए रखने की कीमत अक्सर श्रमिक वर्ग को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और फारस की खाड़ी का इलाका अब लगभग “डार्क ज़ोन” बन चुका है। जीपीएस धोखाधड़ी, इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप और ड्रोन हमलों का लगातार खतरा नौवहन संचालन को मौत के जुए में बदल चुका है। इन जहाजों पर सवार हजारों भारतीय नाविकों के लिए हर घंटा एक अनदेखे खतरे से जूझने जैसा है। ऐसे माहौल का मानसिक प्रभाव भी गहरा है—जहां कई नाविक लंबे समय तक जहाजों में फंसे हुए हैं और सुरक्षित बंदरगाह तक नहीं पहुंच पा रहे।
इसी बीच हिंद महासागर क्षेत्र में एक और गंभीर नौसैनिक घटना ने तनाव बढ़ा दिया। 4 मार्च 2026 को श्रीलंका के गाले तट से लगभग 40 समुद्री मील दूर ईरानी नौसेना का युद्धपोत आईआरआईएस डेना एक समुद्री झड़प में टॉरपीडो हमले का शिकार होकर डूब गया। यह जहाज भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित “मिलान-2026” नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद वापस ईरान लौट रहा था।
श्रीलंका के बचाव दल ने जहाज से 32 नौसैनिकों को बचा लिया, लेकिन जहाज पर मौजूद लगभग 180 कर्मियों में से कई अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इस घटना ने क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री स्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मुद्दा विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित रायसीना डायलॉग में भी चर्चा का विषय बना। श्रीलंका और मालदीव जैसे छोटे देशों ने भी इस घटना पर खुलकर प्रतिक्रिया दी, जबकि भारत की आधिकारिक चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आलोचकों का कहना है कि भारत को अपने रणनीतिक हितों और समुद्री सुरक्षा के सवाल पर स्पष्ट और स्वतंत्र रुख अपनाना चाहिए।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री उद्योग में नाविक उपलब्ध कराने वाले देशों में भारत तीसरे स्थान पर है। देश में लगभग ढाई लाख पंजीकृत पेशेवर नाविक हैं। ये भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम हैं—क्योंकि भारत के 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल और लगभग 50 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति समुद्री मार्गों से ही होती है।
इन नाविकों द्वारा भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा भी देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है, जिससे केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे तटीय राज्यों में लाखों परिवारों का जीवन चलता है।
फिर भी, युद्ध जैसी परिस्थितियों ने यह कड़वी सच्चाई उजागर कर दी है कि संकट के समय इन नाविकों की सुरक्षा और अधिकारों की अनदेखी हो जाती है। कई मामलों में जहाज खतरनाक क्षेत्रों में फंसे हुए हैं, जहाज मालिकों ने संपर्क तोड़ दिया है और आवश्यक वेतन व आपूर्ति भी नहीं पहुंचाई जा रही।
समुद्री श्रम सम्मेलन (Maritime Labour Convention) नाविकों के अधिकारों की रक्षा करने वाला प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कानून है।
इसके तहत नाविकों को युद्ध क्षेत्र में जाने से इंकार करने और तत्काल अपने देश लौटने का अधिकार है। जहाज मालिकों को उनके वेतन और वापसी की लागत का भुगतान करना होता है।
इसी बीच सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू) और उससे संबद्ध फॉरवर्ड सी-मेंस यूनियन ऑफ इंडिया (एफएसयूआई) ने नाविकों की सुरक्षा के लिए पहल की है। यूनियन ने प्रधानमंत्री कार्यालय को ज्ञापन भेजकर संघर्ष क्षेत्रों में फंसे भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना की तैनाती की मांग की है। साथ ही, ऐसे मामलों में कम से कम 45 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की मांग भी की गई है।
भारतीय नाविकों की स्थिति आज हमारी वैश्विक अर्थव्यवस्था की नाजुकता को उजागर करती है। ये वे लोग हैं जो दुनिया के व्यापार को गति देते हैं, लेकिन संकट के समय अक्सर सबसे असुरक्षित रह जाते हैं।
यदि हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ता तनाव जारी रहता है, तो भारत सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाएगा कि वह चुप्पी तोड़कर ठोस कदम उठाए। क्योंकि यदि समुद्रों में काम करने वाले ये नाविक ही सुरक्षित नहीं होंगे, तो वैश्विक व्यापार की धड़कन भी थम सकती है।
