मंडला जिला चिकित्सालय का बुरा हाल
समय से पहले और समय के बाद भी नदारद रहते हैं डॉक्टर, मरीज होते हैं परेशान
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला।
आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में केंद्र और राज्य सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं, ताकि हर व्यक्ति को समय पर इलाज मिल सके। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को इन योजनाओं को धरातल पर लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है, वे मानो जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर आराम फरमाते नजर आ रहे हैं।
वही जिले में शिक्षा, सड़क, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति लगातार सवालों के घेरे में है। ऐसे में जिम्मेदारी केवल विभागीय अधिकारियों की ही नहीं बल्कि जिले के जनप्रतिनिधियों—मंत्री, विधायक और सांसद—की भी बनती है। लेकिन अक्सर यह देखने में आता है कि मंचों से बड़े-बड़े भाषण देकर विकास के दावे किए जाते हैं, जबकि आम जनता आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए भटकने को मजबूर है।
इसी का ताजा उदाहरण मंडला जिला चिकित्सालय है, जो इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में है। यहां मंडला नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से रोजाना सैकड़ों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। लेकिन अस्पताल में मरीजों को इलाज से ज्यादा लंबा इंतजार और अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है।
मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि अस्पताल में पंजीयन कराने के बाद जब वे डॉक्टर के कक्ष तक पहुंचते हैं तो कई बार डॉक्टर अपनी सीट पर मौजूद ही नहीं मिलते। आरोप है कि कई डॉक्टर समय से पहले ही अस्पताल से चले जाते हैं या समय पर पहुंचते ही नहीं।
नतीजा यह होता है कि घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी मरीजों को इलाज नहीं मिल पाता।
इतना ही नहीं, अस्पताल में दवाइयों की कमी की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। मरीजों का कहना है कि सरकारी अस्पताल होने के बावजूद डॉक्टर अक्सर बाहर की दवाइयां लिख देते हैं, जिससे गरीब और ग्रामीण मरीजों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
ऐसे हालात में सवाल उठना लाजिमी है कि जब जिला मुख्यालय का अस्पताल ही बदहाल स्थिति में है, तो दूर-दराज के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की हालत क्या होगी।
जिले के नागरिकों का कहना है कि जिला प्रशासन को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल की व्यवस्थाओं की जांच करानी चाहिए और जो भी डॉक्टर या कर्मचारी लापरवाही बरत रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
अगर समय रहते स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया तो मरीजों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं, जिसका खामियाजा सीधे आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
