स्थानांतरण नीति को ठेंगा दिखा रहे ‘अंगद के पैर’, क्या सरकार से भी बड़े हो गए रसूखदार अधिकारी-कर्मचारी?

Revanchal
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सालों से मलाईदार कुर्सियों पर जमे ‘बरगद’ को हिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे नेता; जनता में सुगबुगाहट तेज, क्या सरकार पर भारी पड़ रही प्रशासनिक साठगांठ?

विनोद दुबे जिला ब्यूरो

दैनिक रेवांचल टाइम्स सिवनी – लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई सरकार और जनप्रतिनिधियों को सबसे ताकतवर माना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। शासन की ट्रांसफर नीति हर साल कागजों पर गरजती है, लेकिन धरातल पर आकर दम तोड़ देती है। सालों से एक ही जगह और मलाईदार कुर्सियों पर कुंडली मारकर बैठे कुछ अधिकारी और कर्मचारी अब प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ‘अंगद का पैर’ बन चुके हैं। आलम यह है कि इन्हें अपनी जगह से हिलाना तो दूर, इनके खिलाफ विचार करने तक की हिम्मत भी शासन-प्रशासन और स्थानीय राजनेता नहीं जुटा पा रहे हैं।

पाताल तक फैली जड़ें: क्या नेताओं के ‘चहेते’ हैं ये प्रशासनिक बरगद?

अब आम जनता के बीच यह सवाल तेजी से गूंजने लगा है कि आखिर इन अधिकारियों और कर्मचारियों की जड़ें इतनी मजबूत कैसे हो गईं? क्या ये रसूखदार लोग सत्तासीन नेताओं और आला हाकिमों के इतने चहेते हैं कि इन पर कोई नियम लागू नहीं होता? या फिर ये भ्रष्टाचार के ऐसे विशाल ‘बरगद’ बन चुके हैं, जिनके आगे पूरी व्यवस्था ही नतमस्तक हो चुकी है। चर्चा तो यहाँ तक है कि ट्रांसफर की सूची बनाने वाले भी इनके रसूख के आगे अपनी कलम चलाने से डरते हैं।

लाचार तंत्र: शिकायतों पर मौन विभाग, इशारों पर नाच रहे बड़े हाकिम

इस पूरे खेल का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन ‘अंगद के पैरों’ के खिलाफ होने वाली गंभीर शिकायतों को भी विभाग रद्दी की टोकरी में डाल देता है। न तो इनकी संदिग्ध कार्यप्रणाली की कोई जांच होती है और न ही इनके द्वारा किए जा रहे कारनामों पर कोई संज्ञान लिया जाता है। उलटे, जिले के कई बेबस आला अधिकारी और नेता इन रसूखदारों के आगे-पीछे घूमते और इनके इशारों पर प्रशासन चलाते नजर आते हैं। जब रक्षक ही भक्षक के सामने नतमस्तक हो जाए, तो पूरा जिला और प्रदेश ‘भगवान भरोसे’ ही चलेगा।

साख पर बट्टा: जनता के बीच धूमिल होती सरकार की छवि

इन बेलगाम कर्मचारियों की तानाशाही और सुस्त कार्यप्रणाली का सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। छोटे-छोटे कामों के लिए जनता भटक रही है, जिससे शासन के प्रति भारी आक्रोश पनप रहा है। नेताओं और सरकार को यह समझना होगा कि भले ही वे आज निजी स्वार्थ या मजबूरी वश इन भ्रष्ट और जमे हुए चेहरों को नहीं हटा पा रहे हैं, लेकिन इनकी वजह से जनता के बीच सरकार की छवि पूरी तरह खराब हो रही है।

चेतावनी: रसूखदार न उखड़े, तो जनता बदल देगी सत्ता का रुख!

राजनीतिक गलियारों और चौपालों पर अब यह साफ चर्चा है कि अगर सरकार ने समय रहते इन ‘अंगद के पैरों’ को नहीं उखाड़ा, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इतिहास गवाह है कि प्रशासनिक तंत्र जब जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझने लगता है, तो जनता इन अधिकारियों को तो नहीं बदल पाती, लेकिन चुनाव में अपनी सबसे बड़ी ताकत का इस्तेमाल कर ‘सरकार’ को जरूर उखाड़ फेंकती है। वक्त रहते आत्ममंथन जरूरी है, वरना बहुत देर हो जाएगी।

“यह समाचार किसी व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं, बल्कि उस सड़ चुकी प्रशासनिक व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है जो जनता के टैक्स के पैसे पर पलकर जनता को ही आंखें दिखा रही है। जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।”

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