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राजनीति में कुछ बड़े चेहरे के पीछे छोटी-छोटी ओछी बातें होती हैं

लेखक – चंद्रकांत सी पूजारी, गुजरात

दैनिक रेवांचल टाईम्स – राजनीति में कुछ बड़े चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी चमक दूर से बहुत आकर्षक दिखाई देती है, पर जब उन्हें पास से देखा जाए तो उनके पीछे कई छोटी-छोटी, ओछी और स्वार्थपूर्ण बातें छिपी मिलती हैं। यही राजनीति का एक कटु यथार्थ है—जहाँ व्यक्तित्व का आकार बड़ा होता जाता है, पर कई बार चरित्र का कद उतना ही छोटा रह जाता है।

बाहरी चमक और भीतर की सच्चाई

राजनीति में छवि (इमेज) बहुत मायने रखती है। मंच पर दिया गया एक भाषण, जनता के बीच दी गई मुस्कान और मीडिया में दिखाया गया आदर्शवादी रूप—ये सब मिलकर एक “बड़ा चेहरा” तैयार करते हैं। लेकिन अक्सर यह चेहरा एक आवरण होता है, जिसके पीछे निजी स्वार्थ, अहंकार, पद-लालसा और छोटे स्तर की मानसिकता छिपी रहती है।
अर्थात् जो व्यक्ति जनता के सामने राष्ट्रहित की बड़ी-बड़ी बातें करता है, वही बंद कमरों में व्यक्तिगत लाभ की छोटी-छोटी गणनाएँ करता मिलता है।

उदाहरण 1: चुनाव और वादे

मान लीजिए एक नेता चुनाव के समय गाँव-गाँव जाकर लोगों की समस्याएँ सुनता है। वह मंच से कहता है—“मैं जनता का सेवक हूँ।” लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही नेता सबसे पहले अपने रिश्तेदारों को लाभ पहुँचाने, अपने व्यवसाय को बढ़ाने या अपने पद की शक्ति का प्रदर्शन करने में लग जाता है।
यहाँ बड़ा चेहरा “जनसेवा” का है, पर पीछे छिपी बात “निजी स्वार्थ” की है। जनता के लिए किए गए वादे केवल भाषण तक सीमित रह जाते हैं।

उदाहरण 2: नैतिकता की बातें, व्यवहार में असंगति

कई राजनेता ईमानदारी, सादगी और नैतिकता की बातें करते हैं। वे दूसरों को आदर्श जीवन जीने का उपदेश देते हैं। लेकिन यदि उनके निजी जीवन या निर्णयों को देखा जाए, तो वही व्यक्ति छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए नियम तोड़ने में संकोच नहीं करता।
यह वैसा ही है जैसे कोई शिक्षक विद्यार्थियों को अनुशासन सिखाए, पर स्वयं नियमों का पालन न करे। यहाँ बड़ा चेहरा “नैतिकता का प्रतीक” है, पर भीतर छिपी बात “व्यवहारिक असंगति” की है।

उदाहरण 3: जनता की भावनाओं का उपयोग

कई बार बड़े चेहरे जनता की भावनाओं को भड़काकर अपना प्रभाव बनाए रखते हैं। वे लोगों को जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के नाम पर बाँटकर समर्थन जुटाते हैं। बाहरी रूप में वे समाज की रक्षा करने वाले महान नेता दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर उनका उद्देश्य केवल सत्ता बनाए रखना होता है।
यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति आग बुझाने का दावा करे, पर भीतर ही भीतर उसी आग को हवा देता रहे।

उदाहरण 4: विकास के नाम पर दिखावा

कई बार कोई बड़ा चेहरा “विकास” के नाम पर भव्य योजनाओं की घोषणा करता है। बड़े-बड़े पोस्टर, विज्ञापन और उद्घाटन समारोह होते हैं। लेकिन वास्तविकता यह होती है कि योजनाएँ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं या उनमें पारदर्शिता का अभाव होता है।
जनता को विकास का सपना दिखाया जाता है, पर ज़मीनी स्तर पर लाभ सीमित लोगों तक पहुँचता है। यहाँ बड़ा चेहरा “विकास पुरुष” का होता है, पर पीछे छिपी बात “दिखावे और लाभ की राजनीति” की होती है।

ऐसा क्यों होता है?

इस प्रवृत्ति के पीछे कुछ मुख्य कारण हैं—

  • सत्ता का आकर्षण – शक्ति और प्रतिष्ठा व्यक्ति को बदल देती है।
  • छवि-निर्माण की राजनीति – वास्तविकता से अधिक दिखावे पर जोर।
  • जवाबदेही की कमी – जब जवाबदेही कम होती है, तो छोटे स्वार्थ बढ़ते हैं।
  • जनता की भावनात्मकता – लोग व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाते हैं, चरित्र को परखना भूल जाते हैं।

समाज पर प्रभाव

जब बड़े चेहरे के पीछे छोटी सोच छिपी होती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। जनता का विश्वास टूटता है। आदर्शों का महत्व कम हो जाता है। राजनीति सेवा नहीं, अवसरवाद का माध्यम बन जाती है।
धीरे-धीरे लोग यह मानने लगते हैं कि राजनीति में ईमानदारी संभव ही नहीं—और यही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

समाधान क्या हो सकता है?

इस स्थिति से बचने के लिए समाज और नागरिकों को सजग होना होगा।

  • व्यक्तित्व नहीं, कार्यों का मूल्यांकन करें।
  • प्रश्न पूछने की आदत विकसित करें।
  • नैतिकता को केवल भाषण में नहीं, व्यवहार में देखें।

जब जनता सजग होती है, तो बड़े चेहरे भी अपने पीछे की छोटी सोच छिपा नहीं पाते।

अंत में
राजनीति में बड़े चेहरे होना बुरा नहीं है—नेतृत्व के लिए प्रभाव और व्यक्तित्व आवश्यक है। समस्या तब पैदा होती है जब बाहरी महानता के पीछे छोटी, ओछी और स्वार्थपूर्ण मानसिकता छिपी हो।
सच्चा नेता वह नहीं जो बड़ा दिखे, बल्कि वह है जिसका चरित्र भी उसके व्यक्तित्व जितना ही विशाल हो।

इतिहास गवाह है—चमकदार चेहरे समय के साथ फीके पड़ जाते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी सच्चाई अंततः सामने आ ही जाती है।

आज के समय में दिखावा बहुत बढ़ गया है। लोग अपने व्यक्तित्व से अधिक अपनी छवि बनाने में लगे रहते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा, बाहरी सफलता और प्रशंसा की चाह में कई बार वे मानवीय मूल्यों को भूल जाते हैं। परिणाम यह होता है कि बड़े नाम वाले लोग भी छोटी मानसिकता के शिकार हो जाते हैं।

सच्ची महानता चेहरे की चमक या नाम की ऊँचाई में नहीं, बल्कि विचारों की विशालता और व्यवहार की विनम्रता में होती है। इसलिए हमें हमेशा व्यक्ति की पहचान उसके कर्मों से करनी चाहिए, न कि उसकी प्रसिद्धि से।

याद रखिए—
बड़ा चेहरा होना आसान है, बड़ा चरित्र होना कठिन।

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