बिछिया विश्व हिंदू परिषद द्वारा ऐतिहासिक व पौराणिक मान्यताओं का हिंदुत्व तक जन जागरण का संदेश

दैनिक रेवांचल टाइम्स -मंडला
दिनांक 15 फरवरी रविवार को दानीटोला प्रखंड (जनपद क्षेत्र बिछिया) में हिन्दू सम्मेलन कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में विश्व हिन्दू परिषद के विभाग संगठन मंत्री अरविंद जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का प्रारंभ भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं कन्या पूजन के साथ हुआ। इसके बाद कार्यक्रम में उपस्थित ग्रामवासियों, वरिष्ठजनों, मातृशक्तियों का तिलक वंदन से स्वागत किया गया।

हिन्दू सम्मेलन कार्यक्रम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुख्य वक्ता अरविंद जी ने बतलाया कि प्राचीन समय में गोंड राजाओं द्वारा मूर्ति पूजा एवं मन्दिर निर्माण की श्रद्धापूर्वक गौरवशाली परम्परा रखी गई, जिसके अंतर्गत बूढी खेरमाई जबलपुर का लगभग 1500 वर्ष पुराना इतिहास गोंडवाना काल में गोंड जनजाति और उनके शासकों द्वारा स्थापित किया गया था, जो इसे ग्राम देवी (खेरदाई) के रूप में पूजते थे।

पौराणिक महत्व अनुसार कहा जाता है कि एक युद्ध में मुगल सेना से पराजित होने के बाद, गोंड राजा ने यहाँ आराधना की और फिर से अपनी शक्ति प्राप्त कर विजय प्राप्त की। गोंडवाना राज्य में मन्दिर एवं मूर्ति परम्परा आदिकाल से चल रही है।

महारानी दुर्गावती (16वीं शताब्दी) ने जबलपुर के पास मदन महल किले के निकट और बरेला की पहाड़ी पर दो शारदा मंदिरों का निर्माण करवाया था। वे गढ़ा-मंडला राज्य की शासिका थी और उनके कार्यकाल में रानीताल, चेरीताल और अधारताल जैसे जल निकाय भी बनवाए गए। मदन महल किले के पास स्थित जल मंदिर व वीर बावड़ी भी उनके काल की प्रसिद्ध संरचनाएं हैं।

महारानी दुर्गावती द्वारा निर्मित/संबंधित प्रमुख स्थल शारदा मंदिर (मदन महल, जबलपुर), मदन महल किले के नीचे के स्थान में रानी पूजा करने आती थीं। शारदा मंदिर (बरेला, जबलपुर) में पहाड़ी के ऊपर स्थित है। राजा ह्रदय शाह, महारानी दुर्गावती गढ मण्डला, राजा हरचंद्र, महाराष्ट्र जैसे अनेकों गोंड राजाओं द्वारा मन्दिरों का निर्माण एवं मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गयी है।

सैकड़ों मन्दिर एवं मूर्तियाँ आज भी इसके प्रमाण हैं। आज के परिवेश में चुनौती का विषय ये है कि जनजाति राजाओं का अपमान और उनकी परम्परा को क्रिश्चियन और कम्युनिस्ट विचार धारा के द्वारा समाप्त करने षड्यंत्र चल रहा है।

जबकि आकार, निराकार, अर्धाकार, प्रकृति, आकृति आदि सभी उपासना पद्धति परम्परा हिन्दू समाज में है, हमारे पूर्वजों ने सभी प्रकार के पूजा पद्धति जो भारत भूमि में विकसित हुई, उसे सम्मानपूर्वक स्वीकार किया है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, श्रद्धा और आस्था नहीं बदलना चाहिए। आपसी प्रेम और पुरखों के प्रति आदर बना रहे, इसके लिए हम सभी को साथ मिलकर ईसाई मिशनरियों, वामपंथी झूठों और विधर्मी तत्वों का दमन करना होगा।

उक्ताशय के उद्गार मुख्य वक्ता द्वारा सभी ग्रामीणजनों के समक्ष दिए गए। कार्यक्रम में संत समाज, वरिष्ठजन, मातृशक्ति एवं समस्त युवा साथी उपस्थित रहे।

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