नागरिक परिक्रमा-गैस सिलेंडरों की कीमतों में वृद्धि : इस 7 लाख करोड़ रुपये का हिसाब कौन देगा?

Revanchal
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(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)


दैनिक रेवांचल टाइम्स।
देश में रसोई गैस की बढ़ती कीमतों को लेकर फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। अब 924 रुपये वाला गैर-सब्सिडी घरेलू सिलेंडर 984 रुपये में, व्यावसायिक सिलेंडर 1923.50 रुपये की जगह 2085.50 रुपये में तथा उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाला सिलेंडर 553 रुपये से बढ़कर 613 रुपये में उपलब्ध होगा।


इससे पहले अप्रैल 2025 में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में 50 रुपये तथा 1 मार्च को व्यावसायिक सिलेंडर की कीमत में 28 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। आलोचकों का कहना है कि पिछले एक दशक में गैस सिलेंडर की कीमतों में बड़ी वृद्धि हुई है। वर्ष 2014 में दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत लगभग 410 रुपये थी, जो अब 1100 रुपये के आसपास पहुंच चुकी है।
देश में हर वर्ष लगभग 180 करोड़ गैस सिलेंडरों की खपत बताई जाती है। ऐसे में आलोचकों का तर्क है कि कीमतों में वृद्धि का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है और इससे महंगाई का दबाव बढ़ता है। उनका कहना है कि यदि सरकार करों में कुछ राहत दे तो उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।


सरकार की ओर से इन बढ़ोतरी के पीछे वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव को कारण बताया जाता है। वहीं विरोधी पक्ष का तर्क है कि महंगाई के दौर में यह बढ़ोतरी मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग के लिए अतिरिक्त बोझ बनती जा रही है।

किताबों पर प्रतिबंध और अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल


सरकारों द्वारा किताबों पर प्रतिबंध लगाने का मुद्दा भी समय-समय पर चर्चा में रहा है। आलोचकों का मानना है कि लोकतंत्र में विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण आवश्यक है।


हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाए जाने की चर्चा रही है। इनमें कुछ प्रसिद्ध लेखकों की किताबें भी शामिल बताई गईं। प्रतिबंध लगाने के पीछे तर्क यह दिया गया कि इन पुस्तकों से देश की एकता और अखंडता पर असर पड़ सकता है।


हालांकि कई बुद्धिजीवी मानते हैं कि विचारों और इतिहास की विभिन्न व्याख्याओं को पढ़ना और समझना लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। उनका तर्क है कि विचारों को दबाने से विवाद समाप्त नहीं होते, बल्कि बहस और अधिक गहरी हो जाती है।


हाल में न्यायपालिका से जुड़े एक संदर्भ में भी पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को लेकर विवाद सामने आया है। इस बहस ने फिर यह सवाल खड़ा किया है कि शिक्षा, अभिव्यक्ति और संस्थाओं की गरिमा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना और सुधार की मांग भी एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता और सुधार की दिशा में संवाद होना जरूरी है, ताकि संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहे।


(लेखक: संजय पराते, अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष)

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