दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला
मध्यप्रदेश का आदिवासी बाहुल्य जिला मंडला आज विकास का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की खुली लूट और भ्रष्टाचार के संरक्षण का उदाहरण बनता जा रहा है। जनपद पंचायत से लेकर ग्राम पंचायत तक, योजनाएं जनता के लिए नहीं बल्कि अधिकारियों–कर्मचारियों की निजी कमाई का साधन बन चुकी हैं।

स्थिति यह है कि जनपद पंचायतों में बैठे मुख्य कार्यपालन अधिकारी, सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और तकनीकी अमला मिलकर पंचायतों में संचालित योजनाओं को खोखला कर रहे हैं। ऊपर से जिम्मेदार अधिकारी जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभा रहे हैं—न सजा, न कार्रवाई। नतीजा यह कि फाइलें या तो गायब हो जाती हैं, या फिर कार्यालयों के किसी कोने में धूल फांकती रह जाती हैं। यही कारण है कि पंचायतीराज व्यवस्था में आज बेरोकटोक भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है।
पत्नी के नाम से बिल, पंचायत निधि से भुगतान
पंचायतीराज व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक गंभीर मामला जिला मुख्यालय अंतर्गत जनपद पंचायत निवास की ग्राम पंचायत भानपुर बिसौरा और सरसवाही से सामने आया है। यहां पदस्थ पंचायत सचिव लक्ष्मण दास पिटानिया पर वर्षों से परिवहन और मटेरियल सप्लाई के नाम पर फर्जी और नियमविरुद्ध बिल लगाने के गंभीर आरोप हैं।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यह कथित भ्रष्टाचार किसी बाहरी ठेकेदार द्वारा नहीं, बल्कि खुद पंचायत सचिव द्वारा अपनी पत्नी के नाम से बिल लगाकर किया गया। सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों की पड़ताल में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सचिव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने ही परिवार को सीधा आर्थिक लाभ पहुंचाया।
नर्मदे हर ट्रेवल्स और संदिग्ध खाता
जानकारी के अनुसार वर्ष 2024 से लगातार पंचायतों में वाहन परिवहन और मटेरियल सप्लाई के नाम पर बिल लगाए गए। ये बिल नर्मदे हर ट्रेवल्स के नाम से ग्राम बिसौरा सहित अन्य पंचायतों में लगाए गए, जिनका खाता क्रमांक 31197843773 बताया जा रहा है।
सूत्रों का दावा है कि यह खाता पंचायत सचिव की पत्नी के नाम से संचालित है। इसके बावजूद इन सभी बिलों का पूर्ण भुगतान पंचायत निधि से किया गया—यानी सीधे तौर पर शासकीय धन का दुरुपयोग।
नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं—
कोई भी पंचायत सचिव अपने परिवार के सदस्य के नाम से
न तो सप्लाई कर सकता है
न ही भुगतान स्वीकृत करवा सकता है
फिर भी वर्षों तक यह खेल चलता रहा और किसी अधिकारी ने संज्ञान लेना जरूरी नहीं समझा।
अतिरिक्त प्रभार बना भ्रष्टाचार का हथियार
मामला तब और गंभीर हो गया जब सचिव लक्ष्मण दास पिटानिया को ग्राम पंचायत भानपुर बिसौरा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। अतिरिक्त प्रभार मिलते ही वाहन परिवहन के नाम पर एक और बिल लगाया गया।
जब इस बिल की स्थानीय स्तर पर जांच शुरू हुई और पुराने दस्तावेज खंगाले गए, तो यह भी सामने आया कि यह भुगतान भी सचिव की पत्नी से जुड़े खाते में किया गया। इसके बाद पंचायत के पुराने रिकॉर्ड सामने आए और एक के बाद एक कई ऐसे भुगतान उजागर हुए, जिनमें सीधे सचिव के परिवार को लाभ पहुंचाया गया।
एक नहीं, कई पंचायतों में फैला खेल
सूत्रों का कहना है कि यह धांधली केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रही। सचिव ने तीन से चार ग्राम पंचायतों को चिन्हित कर वर्षों तक यही तरीका अपनाया—
कहीं मटेरियल सप्लाई, कहीं वाहन परिवहन, और कहीं खुद ही ठेकेदार की भूमिका में आकर भुगतान लेना।
यानी एक ही व्यक्ति—
काम स्वीकृत करने वाला भुगतान कराने वाला और लाभ उठाने वाला
यह स्थिति सीधे तौर पर हितों के टकराव (Conflict of Interest) और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आती है।
पंचायत राज अधिनियम की खुली अवहेलना
यह पूरा मामला पंचायत राज अधिनियम, वित्तीय नियमों और सेवा आचरण नियमों का खुला उल्लंघन है। शासकीय कर्मचारी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर परिवार को लाभ पहुंचाना सीधे तौर पर—
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम
आपराधिक न्यासभंग
और शासकीय धन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है
इसके बावजूद सवाल यह है—
वर्षों तक यह सब कैसे चलता रहा?
क्या पंचायतों के ऑडिट सिर्फ कागजों में होते रहे?
या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
अधिकारियों की चुप्पी, भ्रष्टाचार की ढाल
इस पूरे मामले में सबसे संदिग्ध भूमिका निगरानी करने वाले अधिकारियों की बनती है। जनपद और जिला स्तर पर मौजूद नियंत्रण व्यवस्था के बावजूद यह भ्रष्टाचार सामने क्यों नहीं आया?
क्या अधिकारियों की चुप्पी ने सचिव को इतना निडर बना दिया कि वह खुलेआम पत्नी के नाम से बिल लगाता रहा?
या फिर यह मान लिया जाए कि इस पूरे खेल पर किसी न किसी स्तर पर संरक्षण दिया गया?
संघ का पद, जवाबदेही का सवाल
मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि सचिव लक्ष्मण दास पिटानिया वर्तमान में सचिव संघ, निवास ब्लॉक के अध्यक्ष भी होने की जानकारी प्राप्त हुई हैं।
एक ओर संघ का पद मर्यादा और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है, वहीं दूसरी ओर उसी पद पर बैठा व्यक्ति गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ है।
अब सवाल यह है—
क्या संघ अपने ही अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई करेगा?
या फिर यह पद भ्रष्टाचार को बचाने की ढाल बनकर रह जाएगा?
जनता का पैसा, निजी जेब
पंचायत का पैसा गांव के विकास, सड़क, पानी, साफ-सफाई और गरीबों के कल्याण—के लिए होता है।
लेकिन जब वही पैसा सचिव और उसके परिवार की जेब में जाने लगे, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि ग्रामीणों के अधिकारों पर सीधा डाका है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कई कार्य आज भी अधूरे हैं, लेकिन कागजों में भुगतान पूरा दिखा दिया गया।
अब निगाहें जांच और कार्रवाई पर
अब देखना यह है कि—
क्या निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होगी?
क्या सचिव के खिलाफ एफआईआर और विभागीय कार्रवाई होगी?
या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा?
यदि प्रशासन ने इस बार सख्ती नहीं दिखाई, तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार को खुली छूट है।
इनका कहना
“पूरा मामला आपके माध्यम से संज्ञान में आया है। सभी दस्तावेजों की जांच कर जनपद सीईओ को जानकारी दी जाएगी।”
— धनसिंह धुर्वे, पंचायत इंस्पेक्टर
“मैं अपनी पत्नी के नाम से बिल लगाता रहा हूं। मेरी पत्नी के पास ट्रैक्टर और बोलेरो है, जिनका बिल वर्षों से लगाया जा रहा है।”
— लक्ष्मण दास पिटानिया, पंचायत सचिव
जनपद पंचायत निवास की मुख्य कार्यपालन अधिकारी से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं हुआ।
— श्रद्धा सोनी, जनपद सीईओ, निवास
