सीएम हेल्पलाइन भी बनी ‘औपचारिकता’, किसान दर-दर भटकने को मजबूर
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला।
सरकार किसानों की आय दोगुनी करने और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के दावे कर रही है, लेकिन मंडला जिले में जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। प्रधानमंत्री के नाम से संचालित प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी महत्वाकांक्षी योजना में भारी लापरवाही और मनमानी का मामला सामने आया है, जहां एक पात्र किसान को पूरे दो साल से लाभ से वंचित रखा गया।
तहसील नैनपुर के ग्राम परसवाड़ा निवासी किसान मनोज सिंह कुशवाह ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उनकी मां को नियमित रूप से किसान सम्मान निधि और मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना की राशि मिल रही थी, लेकिन लगभग दो वर्ष पूर्व उनके निधन के बाद सभी आवश्यक दस्तावेज नायब तहसीलदार कार्यालय में जमा करने और सेल्फ रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद उन्हें आज तक योजना का लाभ नहीं मिला।
दस्तावेज पूरे… फिर भी भुगतान बंद
किसान का आरोप है कि—
हर बार नया बहाना बनाकर फाइल रोकी जाती है, दस्तावेज पूर्ण होने के बाद भी नाम अपडेट नहीं किया गया
सीएम हेल्पलाइन में शिकायत करने पर “निराकरण” बताकर मामला बंद कर दिया जाता है, जमीन पर कोई समाधान नहीं
इस पूरे घटनाक्रम ने राजस्व अमले की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या यह महज लापरवाही है या फिर पात्र किसानों को जानबूझकर योजनाओं से दूर रखा जा रहा है?
जनकल्याणकारी योजनाओं का ‘फाइलों में क्रियान्वयन’
जिले में कई ऐसे किसान हैं जिनका नया पंजीयन आज तक नहीं हुआ। घर-घर जाकर पंजीयन करने का दावा करने वाला तंत्र कार्यालयों तक सीमित है। परिणाम, पात्र किसान योजना से बाहर और अपात्रों को लाभ मिलने की चर्चाएं।
सबसे बड़ा सवाल—भरपाई कौन करेगा?
दो वर्षों की राशि रुकी रहने से किसान को आर्थिक नुकसान हुआ है। अब प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि—
क्या शासन 2 साल की पूरी राशि ब्याज सहित देगा?
क्या जिम्मेदार पटवारी, राजस्व निरीक्षक और तत्कालीन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?
सीएम हेल्पलाइन की मॉनिटरिंग सिर्फ कागजों तक ही सीमित क्यों?
किसान की मांग
मनोज सिंह कुशवाह ने साफ कहा है कि—
दोषी अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई हो
दो वर्षों की लंबित राशि की भरपाई कराई जाए, उन्हें विधिवत दोनों योजनाओं का लाभ दिया जाए, अब यह मामला सिर्फ एक किसान का नहीं, बल्कि उन तमाम किसानों की आवाज बन गया है जो योजनाओं के नाम पर दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
अगर पात्र किसान को उसका हक नहीं मिला तो “किसान सम्मान” सिर्फ नारे तक ही सीमित रह जाएगा।
