विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की गलती की सजा भुगत रहा किसान
दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।
वर्तमान समय में देश-प्रदेश का किसान खरीफ धान फसल की बुवाई की तैयारी में जुटा हुआ है। वहीं दूसरी ओर किसानों को खाद जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए लंबी-लंबी कतारों में लगकर खरीदारी करनी पड़ रही है।
एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया की बात करती है, तो दूसरी तरफ उसी डिजिटल व्यवस्था में किसान अपनी जमीन और खसरे की जानकारी ढूंढने के लिए परेशान हो रहा है। कहीं किसानों को अपनी किसान आईडी में स्वयं के खसरे दिखाई नहीं दे रहे, तो कहीं किसान आईडी बनवाने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
मंडला के बिनैका निवासी संकट मोचन चंद्रोल ने बताया कि वे एक छोटे किसान हैं। उनके नाम पर लगभग ढाई एकड़ जमीन संयुक्त खातेदारों के नाम पर दर्ज है। जब धान बुवाई के लिए खाद-बीज की आवश्यकता पड़ी, तो उन्होंने ऑनलाइन दुकान में किसान आईडी बनवाने का प्रयास किया। वहां उन्हें पता चला कि उनका सही नाम “संकट मोचन चंद्रोल” की जगह “शंकर मोचन चंद्रोल” दर्ज कर दिया गया है।
इस संबंध में किसान ने पटवारी से संपर्क किया, जहां उन्हें बताया गया कि यह विभागीय त्रुटि है। पिछले लगभग दो महीनों से इस गलती की सजा किसान भुगत रहा है और कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते परेशान हो चुका है।
नाम सुधार के लिए किसान ने अनुविभागीय अधिकारी, मंडला के यहां आवेदन दिया। आवेदन स्वीकार कर फाइल तहसीलदार को भेजी गई। इसके बाद पटवारी रिपोर्ट तैयार कर प्रतिवेदन जमा किया गया। लेकिन जब किसान फाइल की प्रगति जानने तहसील कार्यालय पहुंचा, तो वहां बड़े बाबू ने पटवारी रिपोर्ट में त्रुटि बताकर दोबारा प्रतिवेदन जमा करने को कहा।
अब सवाल यह उठता है कि जब पटवारी ने रिपोर्ट तैयार कर जमा की और कार्यालय ने उसे स्वीकार भी कर लिया, तो उसी समय त्रुटि क्यों नहीं बताई गई? किसान बार-बार पटवारी और कार्यालयों के बीच भटकने को मजबूर है। न तो उसका नाम सुधर पा रहा है और न ही समस्या का समाधान हो पा रहा है।
किसान को नहीं मिल रही खाद
विभागीय त्रुटि के कारण किसान की किसान आईडी नहीं बन पा रही है, जिससे उसे खाद भी नहीं मिल रही। किसान का कहना है कि डिजिटल इंडिया में यदि एक नाम की त्रुटि सुधारने के लिए महीनों तक भटकना पड़े, तो यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
किसान ने भावुक होकर कहा कि यदि समय पर खाद नहीं मिलने से फसल प्रभावित होती है या उत्पादन कम होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी राजस्व विभाग और संबंधित अधिकारियों की होगी। साथ ही उन्होंने बतलाया की अगामी होने वाले नुकसान का हर्जाना विभागीय त्रुटि करने वालों से वसूला करने की मांग किसान द्वारा सक्षम अधिकारियो से की जाएगी।
इनका कहना है:
“मेरा नाम संकट मोचन चंद्रोल है, लेकिन राजस्व विभाग की गलती से मुझे शंकर मोचन चंद्रोल बना दिया गया। अपना ही नाम सुधारवाने के लिए मैं डेढ़ महीने से कार्यालयों के चक्कर लगा रहा हूं। तरह-तरह के नियम और कानून बताकर मुझे परेशान किया जा रहा है। पता नहीं ऐसे कितने किसान होंगे जिन्हें विभागीय त्रुटियों के कारण खाद नहीं मिल पा रही और परेशानी झेलनी पड़ रही है।” — संकट मोचन चंद्रोल, किसान
