दक्षिण पन्ना के वनकर्मी ने आल्हा गीत के माध्यम से साँपों के संबंध में बच्चों को जागरूक
नागपंचमी पर लोकपरंपरा में दिखी वैज्ञानिक चेतना
नागपंचमी के अवसर पर दक्षिण पन्ना वनमण्डल की मोहन्द्रा रेंज में पदस्थ वनरक्षक द्वारा जनजागरूकता की एक सराहनीय पहल की गई। उन्होंने आल्हा तर्ज में एक हिंदी-बुंदेली गीत की रचना कर, साँपों से जुड़े प्रचलित मिथकों और उनके वैज्ञानिक तथ्यों को प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। यह गीत पीएम श्री शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कुंवरपुर में विद्यार्थियों के समक्ष गाया गया, जिसका उद्देश्य बच्चों में साँपों के प्रति डर और अंधविश्वास को हटाकर एक वैज्ञानिक एवं सह-अस्तित्व की सोच विकसित करना था।
गीत के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि साँप दूध नहीं पीते क्योंकि उनका पाचन तंत्र इसके लिए उपयुक्त नहीं होता, और नागपंचमी पर दूध चढ़ाना उनकी सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। इसी प्रकार यह भी बताया गया कि साँप न तो बदला लेते हैं और न ही चेहरा याद रखते हैं, बल्कि भय की स्थिति में ही प्रतिक्रिया करते हैं। साँप के काटने की स्थिति में झाड़-फूँक जैसे अंधविश्वास की जगह समय पर अस्पताल पहुँचकर एंटीवेनम उपचार ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है।
गीत में यह तथ्य भी साझा किया गया कि भारत में पाए जाने वाले अधिकांश साँप विषहीन होते हैं और केवल कुछ ही प्रजातियाँ ज़हरीली होती हैं, इसलिए अकारण भय और मारने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। बीन की धुन पर साँपों के नाचने की धारणा को भी खंडित किया गया और बताया गया कि साँप ध्वनि नहीं सुनते, वे केवल गति और कंपन को महसूस करते हैं। साथ ही ‘नागमणि’ जैसी लोककथाओं को वैज्ञानिक रूप से निराधार बताया गया, जो अक्सर साँपों के अवैध शिकार और व्यापार को बढ़ावा देती हैं।
इस गीत के माध्यम से विद्यार्थियों को यह भी समझाया गया कि साँप स्वभाव से क्रूर नहीं होते, बल्कि आमतौर पर शांत रहते हैं और केवल डर या खतरे की स्थिति में आत्मरक्षा के रूप में काटते हैं। इस प्रकार की लोकशैली में प्रस्तुत जनजागरूकता गतिविधियाँ न केवल जानकारी प्रदान करती हैं, बल्कि बच्चों और समुदाय में प्रकृति तथा वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना भी जागृत करती हैं। यह प्रयास साँपों के संरक्षण और वैज्ञानिक सोच के प्रसार की दिशा में एक रचनात्मक व प्रभावशाली उदाहरण बनकर उभरा है।
