माँ नर्मदा की सहायक बंजर नदी पर ‘विकास’ के नाम पर वार

हर साल मिट्टी डालो – बारिश में बहाओ, सरकारी पैसा डुबाओ! जनपद की करतूत पर प्रशासन मौन, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी सवालों में

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।मंडला में विकास के नाम पर बंजर नदी का गला घोंटने का खेल वर्षों से जारी है। जनपद पंचायत द्वारा पुरवा, हिरदेनगर, टिकरवारा, तिलैया टोला सहित कई स्थानों पर आवागमन के लिए अस्थायी पुल बनाने के नाम पर सैकड़ों ट्रॉली मिट्टी, मुरुम और पाइप नदी में डाले जाते रहे और हर साल बारिश में वही सामग्री बहकर माँ नर्मदा में समा जाती रही।

सरकारी पैसा पानी में और नदी की सेहत बर्बाद — यह सिलसिला

जिम्मेदारों की खुली लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।नदी नहीं, मानो डंपिंग ग्राउंड बना दियालगातार की जा रही भराई से बंजर नदी की गहराई कम होती जा रही है।

स्वच्छ जलधारा अब मलबे और गंदगी से पटती नजर आ रही है। ठेकेदारों ने पक्के पुल निर्माण के दौरान भी नदी की धारा को पाटकर काम पूरा किया और निर्माण का मलबा नदी में ही छोड़ दिया। सवाल यह है कि क्या नदियों को खत्म करने का ठेका दे दिया गया है?

अस्थायी पुल के नाम पर सालों से आर्थिक खेलयदि स्थायी पुल बनना ही था तो हर वर्ष लाखों रुपये खर्च कर अस्थायी सड़कें क्यों बनाई गईं?

किसकी जेब भरने के लिए यह खेल चलता रहा?

किस अधिकारी ने इसकी अनुमति दी?और सबसे बड़ा सवाल — अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?जनप्रतिनिधियों की खामोशी पर उठे सवालनर्मदा और उसकी सहायक नदी को जीवनधारा बताने वाले जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर मौन क्यों हैं? क्या उन्हें नदी का अस्तित्व नहीं दिख रहा या फिर यह सब उनकी जानकारी और संरक्षण में हो रहा है?

पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम हत्यान नदी की धारा की चिंता, न जलधारण क्षमता की, न पर्यावरणीय अनुमति — विकास के नाम पर प्रकृति का सीधा दोहन किया जा रहा है।

आने वाले समय में इसका खामियाजा जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में भुगतना पड़ेगा।जांच नहीं हुई तो होगा बड़ा आंदोलनस्थानीय लोगों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदार अधिकारियों-ठेकेदारों पर एफआईआर और नदी से मलबा हटाकर उसके प्राकृतिक स्वरूप को बहाल करने की मांग की है।

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