मोहगांव माल की फाइलें दबीं, जिला पंचायत कटघरे में
मंडला। जिले की ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। पंचायत पोर्टल पर धुंधले बिल अपलोड कर भुगतान निकालने, बिना स्वीकृति कार्य कराने और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप सामने आने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। लगातार शिकायतों के बावजूद जांच न होना कई सवाल खड़े कर रहा है – आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह पूरा खेल?
सबसे बड़ा मामला ग्राम पंचायत मोहगांव माल का सामने आया है, जहां 28 अक्टूबर 2025 को वार्ड पंचों ने जिला कलेक्टर और जिला पंचायत मंडला को लिखित शिकायत देकर फर्जी बिलों से भुगतान, बिना अनुमोदन कराए गए कार्यों और अन्य वित्तीय गड़बड़ियों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।
लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी फाइलों में धूल जम रही है और कार्रवाई शून्य है।
धुंधले बिलों से साफ हो रहा खेल
सूत्रों की मानें तो पंचायत पोर्टल पर ऐसे बिल अपलोड किए गए हैं जिनकी गुणवत्ता इतनी खराब है कि वास्तविक सामग्री और भुगतान का मिलान करना मुश्किल हो जाता है। सवाल यह है कि –
क्या यह तकनीकी लापरवाही है?
या फिर सबूत छिपाने की सोची-समझी रणनीति?
शिकायतों का कब्रिस्तान बनता जिला पंचायत कार्यालय?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उन्होंने कई बार आवेदन दिए, लेकिन हर बार जांच का आश्वासन देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
अब आरोप खुलकर सामने आ रहे हैं कि शिकायतों को दबाने के लिए अंदरखाने लेन-देन तक की चर्चाएं हो रही हैं।
यदि यह सच है तो यह केवल पंचायत स्तर का भ्रष्टाचार नहीं बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
डेढ़ से ढाई महीने… कार्रवाई शून्य
इतने गंभीर आरोपों के बाद भी –
न स्थल निरीक्षण
न दस्तावेजों की जांच
न जिम्मेदारों से जवाब-तलब
इस चुप्पी ने प्रशासन की मंशा पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
क्या बड़े स्तर पर है खेल?
जिले की अन्य ग्राम पंचायतों से भी इसी तरह की शिकायतें सामने आ रही हैं।
इससे यह आशंका गहराने लगी है कि मामला केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जिले में संगठित तरीके से वित्तीय अनियमितताओं का नेटवर्क चल रहा है।
जनता पूछ रही – जिम्मेदार कौन?
स्थानीय लोगों का साफ कहना है –
“यदि शिकायत के बाद भी जांच नहीं होगी तो फिर जनसुनवाई और शिकायत व्यवस्था का क्या मतलब?”
पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है, लेकिन वर्तमान हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं।
अब आगे क्या?
शिकायतकर्ताओं ने संकेत दिए हैं कि यदि शीघ्र निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हुई तो वे –
उच्च स्तर पर शिकायत
आरटीआई के माध्यम से दस्तावेज उजागर
लोकायुक्त / आर्थिक अपराध शाखा तक मामला ले जाने
जैसे वैधानिक कदम उठा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल
क्या जिला प्रशासन इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगा
या फिर फाइलें इसी तरह दबती रहेंगी?
