आदिम जाति कल्याण विभाग के डिप्टी कमिश्नर के ठिकानों पर ईओडब्ल्यू की बड़ी कार्रवाई — 5.89 करोड़ की अवैध संपत्ति उजागर

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आदिम जाति कल्याण विभाग के डिप्टी कमिश्नर के ठिकानों पर ईओडब्ल्यू की बड़ी कार्रवाई — 5.89 करोड़ की अवैध संपत्ति उजागर

जबलपुर और भोपाल में छापामारी, आय से अधिक संपत्ति के मामले में दर्ज हुआ प्रकरण

दैनिक रेवांचल टाइम्स जबलपुर
आदिम जाति कल्याण विभाग में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर जगदीश सरवटे के खिलाफ आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। मंगलवार को जबलपुर स्थित उनके शासकीय आवास और भोपाल में निजी घर समेत अन्य ठिकानों पर छापा मारा गया। इस कार्रवाई के दौरान करीब 5 करोड़ 89 लाख 95 हजार 264 रुपये की अनुपातहीन संपत्ति का खुलासा हुआ है।

ईओडब्ल्यू को लंबे समय से संजीव सिंह की संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिल रही थी। इसके बाद उनके खिलाफ धारा 13(1)(b), 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 संशोधित अधिनियम 2018 के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है।

जांच में सामने आई संपत्तियों का ब्यौरा:

जबलपुर स्थित शासकीय आवास की तलाशी में:

दो महंगे मोबाइल फोन
कीमती घड़ी
शराब की कई बोतलें
संदिग्ध दस्तावेज व लेन-देन से जुड़े कागजात
लॉकर की चाबियां व संदिग्ध दस्तावेज

भोपाल के ठिकानों से बरामद:

आलीशान मकान (अनुमानित कीमत: ₹1.25 करोड़)

सोना-चांदी व अन्य आभूषण (अनुमानित मूल्य: ₹19.90 लाख)

14 बैंक खाते

निवेश व बीमा दस्तावेज

6 भूखंड व फ्लैट

लक्ज़री कारें

नगद राशि: ₹2 लाख से अधिक

एक दर्जन से अधिक अधिकारियों की टीम ने की छापेमारी

ईओडब्ल्यू की जांच टीम में एक दर्जन से ज्यादा अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे। कार्रवाई के दौरान जबलपुर और भोपाल दोनों शहरों में अधिकारियों ने एक साथ दबिश दी। भोपाल स्थित बैंक लॉकर को भी खोला गया, जहां से कीमती सामान मिलने की पुष्टि की गई है।

इन धाराओं में दर्ज किया गया मामला:

ईओडब्ल्यू ने संजीव सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13(1)(b) एवं 13(2) के तहत मामला दर्ज किया है, जिसमें आय से अधिक संपत्ति अर्जित करना दंडनीय अपराध है।

जनता में आक्रोश, सवाल – कैसे फलता-फूलता रहा भ्रष्टाचार?

इस कार्रवाई के बाद आमजन में नाराजगी देखी गई। यह सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब अधिकारी की संपत्ति इतनी बढ़ती गई तो विभागीय निगरानी कहां थी? क्या इस पूरे नेटवर्क में और भी बड़े अधिकारी शामिल हैं?

क्या सिर्फ एक डिप्टी कमिश्नर ही दोषी है, या पूरा सिस्टम भी कटघरे में खड़ा होना चाहिए?

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