दैनिक रेवांचल टाइम्स | विशेष रिपोर्ट मंडला, जिले में कुछ दिनों से पुलिस के द्वारा अभियान चलाया जा रहा है जहाँ पर प्रत्येक टू व्हीलर वाहन चालकों को हेलमेट अनिवार्य किया गया है वह नगर में हो या फिर हाईवे सब पर एक ही नियंम बना कर चेकिंग की जा रही है जहाँ पर मरीजों और बुजुर्गों को यह अभियान मुसीबत साबित हो रहा हैं।
“नो हेलमेट, नो पेट्रोल” के सख्त नियम से बढ़ा विवाद — आम लोगों ने गिनाईं रोज़मर्रा की परेशानियां, समाधान की मांग तेज
वही सड़क सुरक्षा के लिए अनिवार्य किया गया हेलमेट अब कई लोगों के लिए परेशानी और तनाव का कारण बनता जा रहा है। जहां एक ओर प्रशासन “नो हेलमेट, नो पेट्रोल” जैसे सख्त नियम लागू कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आम नागरिक इससे जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं।
लोगों की प्रमुख समस्याएं
चश्मा पहनने वालों की दिक्कत
हेलमेट पहनने से चश्माधारी लोगों को नाक पर अतिरिक्त दबाव महसूस हो रहा है। कई लोगों ने बताया कि लंबे समय तक हेलमेट पहनने से असहजता और दर्द बढ़ जाता है।
मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) वाले मरीज परेशान
दिनभर चश्मा पहनने वाले लोगों का कहना है कि हेलमेट उतारते-पहनते समय चश्मा गिर जाता है, जिससे कांच टूटने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
कंधे और गर्दन में दर्द
कुछ लोगों ने हेलमेट के वजन के कारण कंधे और गर्दन में दर्द बढ़ने की बात कही है, खासकर लंबी दूरी तय करने वालों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है।
साइड विज़न में कमी, दुर्घटना का खतरा
लोगों का कहना है कि हेलमेट पहनने से दाएं-बाएं देखना मुश्किल हो जाता है, जिससे आपसी टकराव और छोटी दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं।
तेज रफ्तार युवा, पैदल चलने वालों के लिए खतरा
शिकायत है कि कुछ नवयुवक हेलमेट पहनकर तेज गति से वाहन चलाते हैं, जिससे पैदल चलने वालों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है।
पेट्रोल पंप पर रोज़ का विवाद
“नो हेलमेट, नो पेट्रोल” नियम के चलते पेट्रोल पंपों पर कर्मचारियों और वाहन चालकों के बीच रोज़ाना कहासुनी की स्थिति बन रही है। कई जगहों पर यह विवाद मानसिक तनाव का कारण बन रहा है।
ज़मीनी हकीकत बनाम नियम
लोगों का कहना है कि—
“एसी कमरों में बनाए गए नियम अक्सर ज़मीन पर लागू करते समय व्यावहारिक नहीं रह जाते।”
यानी सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए नियमों को लागू करते समय स्थानीय परिस्थितियों और आम जनता की समस्याओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
बड़ा सवाल
क्या हेलमेट नियमों को लागू करने में सुधार और लचीलापन जरूरी है?
या फिर सख्ती ही एकमात्र रास्ता है?
वही जनता की मांग है कि सुरक्षा के साथ-साथ सुविधा और व्यवहारिकता का संतुलन भी बनाया जाए…जिससे आम नागरिको के साथ साथ मरीजों बुजर्गों की उम्र का भी ध्यान रखते हुए अभियान को सफल बनने की आवश्कता है जिससे अभियान सुरक्षा और आम के लिए सुरक्षित रह सके मुसीबत साबित न हो।
