ठेकेदारी प्रथा के साये में पंचायत का निर्माण कार्य, गुणवत्ता पर सवाल — सरकारी धन से बन रही नाली में भ्रष्टाचार की बू
रेवांचल टाइम्स | मंडला
आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन के बंदरबांट के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। जहाँ पंचायत स्तर पर चल रहे निर्माण कार्यों में सरपंच सचिव रोजगार सहायक, और उपयंत्री के द्वारा स्वयं निर्माण एजेंसी होने के वावजूद ठेकेदारों से कार्य करवा जा रहा है जा ठेकेदार के द्वारा ज्यादा बचत के चलते न गुणवत्ता, न ही तकनीकी मानकों और पारदर्शिता को दरकिनार कर मनमानी किए जाने की शिकायतें आम होती जा रही हैं।
आरोप है कि कई जगहों पर सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और उपयंत्री की कथित मिलीभगत से निर्माण कार्यों को ठेकेदारों के हवाले कर दिया गया है, जबकि नियमों के अनुसार पंचायतों में ठेकेदारी प्रथा लागू नहीं होनी चाहिए। कहि सरपंच पति या सचिव या रोजगार सहायक ही ठेकेदार बन बैठे है तो कही अपने परिवार के ही नाम से एजेंसी या फर्म के नाम पर मैटेरियल सप्लायर बन बैठे है बिल लगाकर सरकारी धन धडाधड निकाला जा रहा है
और गुणवत्ता से कोई लेनदेना नही और जहाँ कार्य की गुणवत्ता रहे जिसको लेकर सरकार ने एक उपयंत्री नियुक्त किये गए हैं, पर वह अपने घर मे बेठे बेठे ही गुणवत्ता और मूल्यांकन कर रहे है सरपंच सचिव खुद ही साहब के घर फाईल ले जाकर हस्ताक्षर करवा लिए जा रहे है उपयंत्री महोदय को फुर्सत भी नही रहती की मौके में जाकर निर्माण कार्य की गुणवत्ता माप ले ले उन्हें फाइल में हस्ताक्षर करने का खर्चा पानी भी मिल रहा है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा ही एक मामला जनपद पंचायत मंडला की ग्राम पंचायत बरगवां के परधान मोहल्ला से सामने आया है, जहां 15वें वित्त आयोग की राशि से लगभग 1 लाख 38 हजार रुपये की लागत से करीब 90 मीटर लंबी नाली का निर्माण कराया जा रहा है। लेकिन यह निर्माण कार्य शुरू से ही सवालों के घेरे में है।
ठेकेदार के भरोसे पंचायत का काम
सूत्रों के अनुसार इस नाली निर्माण का कार्य पंचायत द्वारा सीधे कराने के बजाय अंजनिया–डुंगरिया क्षेत्र के एक ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा है। जबकि पंचायतों में निर्माण कार्य मजदूरों के माध्यम से कराया जाना चाहिए। इसके बावजूद खुलेआम ठेकेदारी के जरिये काम कराए जाने से पंचायत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नाली निर्माण में सरिया गायब, अभी से दिख रही दरारें
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य पूरी तरह से तकनीकी मानकों को ताक पर रखकर किया जा रहा है। नाली निर्माण में मजबूती के लिए लोहे की सरिया का उपयोग जरूरी माना जाता है, लेकिन यहां सरिया का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जा रहा।
स्थिति यह है कि नाली का निर्माण पूरा होने से पहले ही पीसीसी में जगह-जगह दरारें दिखाई देने लगी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो बरसात के मौसम में यह नाली कभी भी क्षतिग्रस्त हो सकती है।
पीसीसी में हनीकॉम्ब, वाइब्रेटर का नहीं हो रहा उपयोग
निर्माण स्थल पर निरीक्षण के दौरान पीसीसी में कई जगह हनीकॉम्ब जैसी स्थिति दिखाई दे रही है, जो सीधे तौर पर घटिया निर्माण की ओर इशारा करती है। विशेषज्ञों के अनुसार जब कंक्रीट को सही तरीके से जमाया नहीं जाता और पर्याप्त कम्पेक्शन नहीं किया जाता, तब इस प्रकार की स्थिति बनती है।
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण के दौरान वाइब्रेटर का उपयोग भी नहीं किया जा रहा, जबकि पीसीसी निर्माण में वाइब्रेटर का इस्तेमाल बेहद जरूरी होता है। इसके अभाव में कंक्रीट में हवा के बुलबुले रह जाते हैं और निर्माण कमजोर हो जाता है।
सूचना बोर्ड भी नहीं, पारदर्शिता पर सवाल
सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य के दौरान स्थल पर सूचना बोर्ड लगाना अनिवार्य होता है, जिसमें योजना का नाम, लागत, निर्माण अवधि और जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी दी जाती है। लेकिन इस निर्माण स्थल पर ऐसा कोई सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया, जिससे कार्य की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
मजदूरों ने भी खोली पोल
मौके पर काम कर रहे मजदूरों ने बताया कि उन्हें बिना सरिया के ही नाली निर्माण करने के निर्देश दिए गए हैं। मजदूरों के अनुसार मसाला तैयार करते समय 12 तसला गिट्टी, 13 तसला रेत और एक बोरी सीमेंट का उपयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह अनुपात तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं है तो निर्माण की मजबूती प्रभावित होना तय है।
शिकायतें होती हैं, कार्रवाई नहीं
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत के जिम्मेदार लोग गुणवत्ता की जांच करने के बजाय केवल औपचारिकता निभा रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब भी इस तरह के मामलों की शिकायत की जाती है तो कागजी जांच का भरोसा दिया जाता है, लेकिन वास्तविक कार्रवाई शायद ही कभी होती है।
सरकारी धन की बर्बादी का खतरा
नाम न छापने की शर्त पर कई ग्रामीणों ने बताया कि सरकार गांवों के विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन यदि निर्माण कार्य ही घटिया होंगे तो ग्रामीणों को इसका लाभ कैसे मिलेगा। उनका कहना है कि यदि नाली जैसी बुनियादी सुविधा कुछ ही महीनों में टूट जाती है तो यह सीधे-सीधे सरकारी धन की बर्बादी है।
ग्रामीणों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराए जाने और पंचायत कार्यों में ठेकेदारी प्रथा के इस्तेमाल की भी जांच करने की मांग की है। साथ ही यदि निर्माण में अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर सख्त कार्रवाई की मांग भी उठाई है।
अब प्रशासन की कार्रवाई पर नजर
अब सवाल यह है कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। यदि समय रहते जांच कर कार्रवाई नहीं की गई तो यह मामला भी पंचायत स्तर पर चल रहे भ्रष्टाचार की एक और मिसाल बनकर रह जाएगा।
फिलहाल ग्रामीणों की नजर जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर टिकी हुई है। लोगों का कहना है कि यदि इस मामले में सख्त कदम उठाए गए तो न केवल इस निर्माण कार्य की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि अन्य पंचायतों में चल रहे ऐसे कार्यों पर भी लगाम लग सकेगी। जिससे सरकारी धन को बर्बादी होने से बचाया जा सकें।
