श्रमण संस्कृति के देदीप्यमान नक्षत्र का अवसान

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला, अनादिनिधन दिगम्बर जैन धर्म में भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीरस्वामीजी के शासन तीर्थ में अनेकों “आचार्य” हुए हैं। जिनमें इक्कीसवीं सदी के सर्वोत्कृष्ट चर्याधारक, परमप्रभावक, बौद्धिक सम्राट, युग नायक, सर्वमान्य संत १०८ “आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज” हुए हैं।

जिन्होंने मुनिचर्या का “छप्पन वर्ष” (56 वर्ष) तक निर्दोष पालन कर विश्व कल्याण की भावना से रोजगार के क्षेत्र में “हथकरघा”, शिक्षा के क्षेत्र में “प्रतिभास्थली”, चिकित्सा के क्षेत्र में “पूर्णायु”,जीवदया की भावना से “दयोदय गौशाला एवं शांतिधारा दुग्ध योजना” जैसे बड़े एवं सफल प्रकल्पों के साथ “इंडिया” नहीं “भारत” बोलो अभियान चला कर “भारत को प्राचीन भारत” बनाने की अलख जगाई।


वे मात्र एक जैन संत नहीं अपितु जन – जन के संत थे। 20 वर्ष की अल्प आयु में आपने गृह त्याग पूर्वक आचार्य श्री देशभूषण जी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत को अंगीकार किया था। 22 वर्ष की उम्र 30 जून सन् 1968 आचार्य श्री ज्ञान सागर जी के द्वारा आपको सीधे “दिगम्बर मुनि दीक्षा” दी गई थी। मुनि दीक्षा के उपरांत 22 नवंबर सन् 1972 में आचार्य श्री ज्ञान सागर जी ने अपने शिष्य को अपना गुरु बना कर आचार्य पद का त्याग कर मुनि श्री विद्या सागर जी को आचार्य पद से सुशोभित किया।

आप एक मात्र ऐसे संत है जिनके दर्शन एवं प्रेरणा से आपके गृहस्थ जीवन के प्रत्येक सदस्य ने संयम को अंगीकार कर मोक्षमार्ग में अपने कदम बढ़ाएं।
प्रथम गुरु दर्शन कर आपने आजीवन वाहन का त्याग कर दिया था अतः आपने अपने संपूर्ण जीवन काल में लगभग 1.25लाख किलो मीटर पद विहार किया। आजीवन चीनी,नमक, तेल, हरी सब्जी, फल, सूखे मेवे (ड्राई फ्रूट्स) दही एवं अंग्रेजी औषधि का त्याग कर आपने अद्वितीय साधना की। साथ ही आपका आजीवन भौतिक साधनों का त्याग, चटाई का त्याग और एक करवट सोने जैसे कठोर नियमों ने आपको त्याग एवं तपस्या की मूर्ति बना दिया था।

आपने साधना के लिए अपना अधिकांश समय शहर से दूर सिद्ध क्षेत्र,अतिशय क्षेत्रों में नदी एवं पहाड़ों के मध्य व्यतित किया। कन्नड़ भाषा भाषी होने के बाद भी आप हिंदी,संस्कृत, अंग्रेजी, प्राकृत जैसे अनेकों भाषा के ज्ञाता थे। आपकी कृति “मूकमाटी महाकाव्य” हिन्दी साहित्य जगत की “कालजयी कृति” मानी जाती है जिसपर विविध शोधार्थियों ने शोध कार्य किया है। आप एकमात्र ऐसे जीवित संत थे जिनके ऊपर “56 से अधिक phd” हो चुकी हैं।

आपका जीवन,आपके आदर्श,आपके सिद्धांत,आपकी चर्या, आपकी रचनाएं प्राणिमात्र के द्वारा वंदनीय एवं अनुकरणीय हैं। आपकी आगम सम्मत निर्दोष चर्या को देख अनेक युवाओं ने वैराग्य पथ पर चलने हेतु आपके आशीर्वाद से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत को धारण किया है। इस प्रकार आप सर्वाधिक दीक्षा प्रदाता कहे जाते हैं। आपने अपने संपूर्ण जीवन में अनियत बिहार (बिना किसी पूर्व सूचना के) ही किया और जीवन के अंतिम क्षणों में आगम सम्मत अप्रकाशित सल्लेखना धारण कर श्रमण संस्कृति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा । “आज से ठीक 2 वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की वसुंधरा पर छत्तीस मूलगुणों के धारी इस युग के भगवान, धरती के देवता,श्रमण संस्कृति के देदीप्यमान नक्षत्र का अवसान हुआ था। शरद पूर्णिमा के अप्रतिम चांद ने चंद्रगिरी के पर्वत पर 17 फरवरी की रात्रि में अपनी अंतिम चांदनी बिखेरी थी।आपका जाना भारत वर्ष के लिए अपूर्ण क्षति है। भारत के माननीय प्रधान मंत्री जी समेत अनेकानेक सम्माननीय जनों ने आपके प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की थी। जब तक जिनशासन रहे तब तक “आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज” की यशः कीर्ति पताका फहराती रहे आप जैसे सर्वोत्कृष्ट साधक सदा सदा इस पृथ्वी मंडल पर जयवंत रहें जयवंत रहें जयवंत रहें।

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