कान्हा टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों का कत्लेआम जिम्मेदार कौन

Revanchal
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तेंदुआ की मौत से फिर सवालों के घेरे में प्रबंधन, बाघों की हत्याएं थमने का नाम नहीं ले रहीं!

दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला। कान्हा नेशनल पार्क, जो कभी वन्यजीवों की सुरक्षित शरणस्थली माना जाता था, अब मौत की घाटी बनता जा रहा है। पार्क प्रबंधन की लापरवाही और नाकामी का एक और ज्वलंत उदाहरण सामने आया है, जहां 19 फरवरी 2026 को एक नर तेंदुए की दर्दनाक मौत हो गई।

घटना किसली वन परिक्षेत्र के अंतर्गत जरियावारे पगडंडी के पास कक्ष क्रमांक 832 (16), बीट लांघादादर में हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया कि तेंदुआ बाघ के हमले का शिकार बना, उसके सिर पर बाघ के दांतों के गहरे निशान मिले। लेकिन सवाल यह है कि पार्क प्रबंधन आखिर इन मौतों का सिलसिला कब तक रोक पाएगा? या फिर ये मौतें प्रबंधन की मिलीभगत और असफल निगरानी का नतीजा हैं?


कान्हा टाइगर रिजर्व, जो मध्य प्रदेश की शान है, में बाघों की मौत की खबरें तो आम हो चुकी हैं, लेकिन अब दुर्लभ तेंदुओं का भी शिकार होना चिंता का विषय बन गया है। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वन्यजीव प्रेमियों का आरोप है कि प्रबंधन की ढिलाई से जंगल में अवैध शिकार, क्षेत्रीय संघर्ष और अपर्याप्त सुरक्षा उपायों ने वन्यजीवों को मौत के मुंह में धकेल दिया है। “पार्क में कैमरा ट्रैप और गश्ती दल कहां हैं? क्यों हर बार मौत के बाद ही जांच शुरू होती है?” – एक स्थानीय कार्यकर्ता ने गुस्से में कहा।


घटना की जांच में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), नई दिल्ली और मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक कार्यालय, भोपाल के दिशानिर्देशों का पालन किया गया। डॉग स्क्वाड की मदद से छानबीन में बाघ की उपस्थिति के साक्ष्य मिले, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

पोस्टमार्टम डॉ. संदीप अग्रवाल (वन्यप्राणी चिकित्सक, कान्हा टाइगर रिजर्व, मंडला), डॉ. दीपाली परते (पशु चिकित्सक, बिलिया) और डॉ. सुरेंद्र टेकाम (पशु चिकित्सक, मंडला) की टीम ने किया, जिसमें तेंदुआ के सभी अंग सुरक्षित पाए गए। शवदाह की कार्यवाही क्षेत्र संचालक रवींद्र गणेश त्रिपाठी, उप संचालक प्रकाश कुमार वर्मा, सहायक संचालक जी. सूरज सिंह सेंट्रल, एनटीसीए प्रतिनिधि ओमकार नर, शंकर भार्गवी तहसीलदार बिछिया, चंद्रेश खरे (मानद वन्यप्राणी अभिरक्षक), श्रीमती श्यामकती उईके (सरपंच, खटिया) और वन परिक्षेत्र किसली के अधिकारियों की उपस्थिति में हुई। पूरी प्रक्रिया की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की गई, लेकिन यह सब महज खानापूर्ति लगती है।


कान्हा प्रबंधन पर आरोप लग रहे हैं कि वे वन्यजीवों की रक्षा में पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों बाघों की मौतें हो चुकी हैं, और अब तेंदुओं का नंबर आ गया है। क्या पर्यटन के नाम पर जंगल को लूटा जा रहा है? क्या प्रबंधन के अधिकारी सोए हुए हैं या फिर कोई बड़ा रैकेट चल रहा है?

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि गश्ती दल की कमी और अवैध प्रवेश ने स्थिति को बदतर बना दिया है। पर्यावरण मंत्रालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए, वरना कान्हा का नाम मौतों के इतिहास में दर्ज हो जाएगा
यह घटना न केवल वन्यजीव संरक्षण की विफलता को दर्शाती है, बल्कि सरकार और प्रबंधन की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करती है।

अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो कान्हा का जंगल खाली हो जाएगा। क्या आप भी इस लापरवाही के खिलाफ आवाज उठाएंगे?

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