दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।
मध्यप्रदेश की फिज़ा इन दिनों कुछ अलग ही “महक” रही है। फर्क बस इतना है कि ये खुशबू किसी बगिया की नहीं, बल्कि कथित करोड़ों की संपत्ति की बताई जा रही है। और खास बात यह कि इसकी चर्चा अब चाय की गुमटी से निकलकर जन-जन तक पहुंच चुकी है।
कहावत तो आपने सुनी ही होगी—मेहनत का फल मीठा होता है
मगर यहां तो फल इतना “रसीला” निकला कि आम आदमी पूछ बैठा—
“साहब, ये फल किस खेत में उगता है…? हमें भी बीज दिलवा दीजिए!”
आम आदमी की जेब में अगर 50 हजार रुपये ज्यादा दिख जाएं, तो बैंक से लेकर पड़ोसी तक पूछताछ शुरू हो जाती है। लेकिन जब बात करोड़ों की हो, तो जवाब मिलता है—
“इतिहास देखिए… पुरानी फाइलें खंगालिए…”
यानी अब कमाई भी इतिहास का विषय बन चुकी है— जितनी पुरानी, उतनी सुरक्षित! कुर्सी का करिश्मा या कमाल?
कहते हैं कुर्सी में ताकत होती है, लेकिन यहां तो कुर्सी कुछ ज्यादा ही “ऊर्जावान” नजर आ रही है।
बैठते ही आय भी तेज रफ्तार पकड़ लेती है और संपत्ति भी उड़ान भरने लगती है।
जनता सोच रही है—
“क्या ये वही कुर्सी है, जिस पर बैठते ही इंसान करोड़पति बन जाता है?”
अगर हां, तो बेरोजगारी दूर करने का इससे बेहतर उपाय क्या होगा—
हर युवक को एक-एक कुर्सी थमा दीजिए!
शिकायतें पहुंचीं ऊंचे दरबार तक
जब मामला सीधे “महामहिम” तक जा पहुंचे, तो समझिए कि कहानी अब हल्की-फुल्की नहीं रही।
अब नजर इस बात पर है कि—
क्या सिस्टम खुद ही अपने आईने में झांकेगा, या फिर वही पुराना क्रम—
फाइलें घूमेंगी, धूल खाएंगी और फिर खामोश हो जाएंगी…
ईमानदारी का नया संस्करण
आजकल ईमानदारी की परिभाषा भी अपडेट हो चुकी है—
अब ईमानदार वही है, जो आरोपों के बीच भी मुस्कुराता रहे और कहे— “प्रक्रिया जारी है…”
जनता का सवाल—सीधा और साफ
जनता अब गोलमोल जवाब नहीं चाहती।
सवाल सीधा है—
अगर सब सही है, तो खुलकर बताइए
और अगर गलत है, तो कार्रवाई दिखाइए
क्योंकि अब जनता सिर्फ वोटर नहीं रही—
वह हिसाब भी मांगती है।
आखिरी तंज…कप्तान साहब,
अगर आपकी संपत्ति सच में नियमों के भीतर है, तो एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दीजिए—
हम भी सीखना चाहेंगे कि
सरकारी नौकरी में “करोड़पति बनने का सिलेबस” क्या है!
और अगर ऐसा कोई सिलेबस नहीं है,
तो फिर जांच एजेंसियों को किताब खोलने दीजिए…
क्योंकि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है—
फाइलें अभी पूरी खुलनी बाकी हैं…!
