75 हजार का मुफ्त इलाज, जीबीएस से जूझ रहा 6 वर्षीय आदर्श फिर चलने लगा
रेवांचल टाइम्स पन्ना। सरकारी अस्पतालों की संवेदनशील और समर्पित चिकित्सा व्यवस्था का एक प्रेरणादायक उदाहरण पन्ना जिला अस्पताल में देखने को मिला, जहां डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन की तत्परता से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे 6 वर्षीय मासूम को नया जीवन मिला। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के इस बच्चे का करीब 75 हजार रुपये का महंगा इलाज पूरी तरह निःशुल्क कर उसे स्वस्थ किया गया।
जानकारी के अनुसार 6 वर्षीय आदर्श, जो मजदूरी करने वाले परिवार का इकलौता पुत्र है, Guillain-Barré Syndrome (जीबीएस) नामक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित हो गया था। बीमारी के चलते उसके शरीर में लगातार कमजोरी बढ़ती गई और वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गया। परिजन इलाज के लिए दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन बच्चे की हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। आखिरकार निराश परिवार बच्चे को लेकर District Hospital Panna पहुंचा।
जिला अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ Dr. P. K. Gupta ने बच्चे की जांच कर बीमारी की पहचान की और तत्काल उपचार शुरू कराया। चिकित्सकों के अनुसार आदर्श को Intravenous Immunoglobulin (IVIG) इंजेक्शन की आवश्यकता थी, जिसकी एक डोज की कीमत लगभग 15 हजार रुपये है। पांच दिन तक चले उपचार में कुल पांच डोज की जरूरत थी, जिसकी लागत करीब 75 हजार रुपये आती है।
परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों ने मानवीय पहल करते हुए पूरा उपचार निःशुल्क उपलब्ध कराया। लगातार पांच दिनों तक IVIG थेरेपी और फिजियोथेरेपी देने के बाद बच्चे की हालत में तेजी से सुधार हुआ। अब आदर्श अपने पैरों पर खड़ा होकर चलने लगा है और सामान्य जीवन की ओर लौट रहा है।
बच्चे के मामा आशीष कुमार ने अस्पताल के चिकित्सकों और स्टाफ के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आर्थिक तंगी के कारण परिवार इतना महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं था, लेकिन जिला अस्पताल ने उनके बच्चे को नया जीवन दे दिया।
शिशु रोग विशेषज्ञ Dr. P. K. Gupta ने बताया कि Guillain-Barré Syndrome एक गंभीर लेकिन उपचार योग्य बीमारी है। समय पर पहचान और सही इलाज मिलने पर मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में उपलब्ध संसाधनों और टीमवर्क की बदौलत बच्चे का सफल उपचार संभव हो पाया।
यह मामला न केवल चिकित्सा सेवा की सफलता की मिसाल है, बल्कि यह भी साबित करता है कि संवेदनशीलता, समर्पण और बेहतर प्रबंधन के साथ सरकारी अस्पतालों में भी जरूरतमंद मरीजों को उच्चस्तरीय उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।
