डिंडोरी कृषि विभाग और आत्मा परियोजना में महाघोटाला
300 शिकायतों के बाद घिरे प्रभारी उपसंचालक अश्वनी झारिया

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला डिंडोरी मध्यप्रदेश के जनजातीय बहुल जिले डिंडोरी से सरकारी खजाने में सेंधमारी और किसानों के नाम पर अरबों रुपये के गबन का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यह पूरी कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी है, जहां कागजों पर धान लहलहा रही है, फाइलों में किसान विदेशों का दौरा कर रहे हैं, और दफ्तरों में बैठकर अधिकारी करोड़ों रुपयों की बंदरबांट कर रहे हैं। मामले के केंद्र में हैं— अश्वनी झारिया जो सहायक संचालक कृषि होने के बावजूद डिंडोरी जिले में एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन सबसे महत्वपूर्ण पदों का जिम्मा संभाल रहे थे। वे प्रभारी उपसंचालक कृषि, प्रभारी परियोजना संचालक ‘आत्मा’ (ATMA – Agricultural Technology Management Agency), और प्रभारी प्राचार्य राज्य कृषि विस्तार एवं प्रशिक्षण केंद्र के रूप में समानांतर हुकूमत चला रहे थे।
जब अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर डिंडोरी के भोले-भाले आदिवासी किसानों ने मोर्चा खोला, तो एक-एक कर ऐसे काले कारनामे उजागर हुए जिसने मंत्रालय से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है। किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा श्री झारिया के संपूर्ण कार्यकाल के दौरान विभिन्न सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष लगभग 300 शिकायती आवेदन दर्ज कराए गए हैं। इन शिकायतों की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के महामहिम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय रक्षा मंत्री, केंद्रीय कृषि मंत्री, और सूबे के मुख्यमंत्री से लेकर देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और लोकायुक्त तक में इस भ्रष्टाचार की गूंज पहुंच चुकी है।
सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त सत्यापित दस्तावेजों और बैंक ट्रांजैक्शन की प्रतियों के आधार पर तैयार यह विस्तृत खोजी रिपोर्ट इस महाघोटाले की हर उस परत को खोलती है, जिसे अब तक फाइलों के नीचे दबा कर रखा गया था
राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची गूंज:
वही जानकारी के अनुसार 300 शिकायतों का रिकॉर्ड इस पूरे मामले की सबसे असाधारण बात यह है कि एक जिले के अधिकारी के खिलाफ जनता को देश की सबसे बड़ी चौखटों पर दस्तक देनी पड़ी। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी गई इस कानूनी और प्रशासनिक जंग का पूरा ब्यौरा इस प्रकार है:
महामहिम राष्ट्रपति कार्यालय की किसानों द्वारा देश के सर्वोच्च पद महामहिम राष्ट्रपति महोदय को रजिस्टर्ड डाक से शिकायती आवेदन भेजा गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रपति कार्यालय ने सीधे मध्यप्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को पत्र जारी कर इस शिकायत पर त्वरित और कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय:
महामहिम उपराष्ट्रपति और माननीय प्रधानमंत्री को क्रमशः एक और सात अलग-अलग शिकायती आवेदन भेजे गए, जिन पर उच्चस्तरीय कार्रवाई अभी अपेक्षित है।
केंद्रीय मंत्रियों और लोकसभा अध्यक्ष की चौखट केंद्रीय रक्षा मंत्री को चार, केंद्रीय कृषि मंत्री को चार और लोकसभा अध्यक्ष को दो बार लिखित शिकायतें भेजी गईं, जिससे यह साफ होता है कि यह मामला केवल स्थानीय स्तर का नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण का मुद्दा बन चुका है।
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) और लोकायुक्त की शरण: आरोपी अधिकारी के खिलाफ माननीय उच्चतम न्यायालय जबलपुर (हाईकोर्ट/सुप्रीम कोर्ट संदर्भ) के समक्ष वकीलों के माध्यम से तीन बार याचिकाएं लगाई गईं। इसमें रिट पिटीशन. LWP 14822 of 2022 में माननीय न्यायालय ने विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायती आवेदनों पर तत्काल विधिक कार्रवाई करने का कड़ा आदेश जारी किया था। इसके साथ ही आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) और लोकायुक्त के समक्ष भी रजिस्टर्ड डाक (जैसे डाक क्रमांक Sp4818800001) के माध्यम से सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई गई है।
विधानसभा और राजनेताओं का हस्तक्षेप: सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह और विधानसभा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह को भी तीन-तीन बार शिकायतें भेजी गईं। इन दोनों शीर्ष नेताओं ने मामले का संज्ञान लेते हुए प्रमुख सचिव (कृषि) और कलेक्टर डिंडोरी को पत्र लिखकर कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।
30 दिवस की समय सीमा का उल्लंघन और आरटीआई में धोखाधड़ी: राज्य और केंद्रीय सूचना आयोग को कुल मिलाकर 24 से अधिक बार शिकायतें भेजी गईं। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए, 30 दिनों की वैधानिक अवधि बीत जाने के बाद भी जानकारी नहीं दी गई। उल्टा, अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों की भारी-भरकम फीस जमा करने के लिए आवेदक को अवैध रूप से डराया और गुमराह किया गया, जो स्वयं एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है。
इस चौतरफा दबाव का ही परिणाम था कि माननीय मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री को भेजी गई 16-16 शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए अंततः प्रमुख सचिव किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग द्वारा अश्वनी झारिया को निलंबित करने की कार्रवाई की गई पर ऐसे भ्रस्ट अधिकारी किसके कृपा पात्र है जो पर्याप्त सबूत के बाद भी आज मंडला जिले म उपसंचालक के पद पर आसीन है और डिंडीरो जिले की तर्ज़ मंडला जिले के किसानों को लूटने की पूरी तैयारी चल रही है इनके ऊपर करोडो क भ्रस्टाचार गबन घोटाले के आरोप लग चुके है वावजूद इसके आज भी विभाग म बने हुए और इनके कार्य प्रणाली की तरह तरह की जनचर्चा है !
वित्तीय डकैती: वित्तीय अधिकार मिलने से पहले ही निकाल लिए लाखों रुपये
इस घोटाले का सबसे सनसनीखेज पहलू प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर की गई सीधे पैसों की निकासी है। नियमों के मुताबिक, जब तक किसी अधिकारी को शासन या संचालनालय से आहरण संवितरण अधिकार (DDO Codes) प्राप्त नहीं होते, वह सरकारी खजाने से एक पाई भी नहीं निकाल सकता। लेकिन डिंडोरी में तो कानून का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का सिक्का चल रहा था।
दस्तावेज बताते हैं कि संयुक्त संचालक कृषि जबलपुर के आदेश दिनांक 11.06.2021 के तहत श्री झारिया को प्रभारी उपसंचालक कृषि और परियोजना संचालक आत्मा का केवल कार्यप्रभार सौंपा गया था। इस आदेश के लगभग 26 दिन बाद, संचालनालय भोपाल के पत्र दिनांक 07.07.2021 द्वारा उन्हें आहरण संवितरण अधिकार (वित्तीय अधिकार) प्रदाय किए गए।
घोटाले की तारीखें और आंकड़े
लेकिन वित्तीय अधिकार मिलने के बहुत पहले ही, दिनांक 05.06.2021 को 9,94,692 रुपय (लगभग 9.94 लाख) और दिनांक 01.07.2021 को 3,13,054 रुपये (लगभग 3.13 लाख), इसके अलावा एक और ट्रांजैक्शन 13,07,746 रुपये सहित कुल मिलाकर 26,15,492 रुपये (26.15 लाख से अधिक) की शासकीय राशि का नियम विरुद्ध आहरण कर सीधे गबन कर लिया गया। बैंक भुगतान की प्रमाणित प्रतियां चीख-चीख कर इस वित्तीय धोखाधड़ी की गवाही दे रही हैं, जो सीधे तौर पर एक अक्षम्य और गंभीर आपराधिक कृत्य है।
कैशबुक में काली कमाई: मद और देयक गायब, चहेतों पर लुटाए पैसे
किसी भी सरकारी दफ्तर का सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय दस्तावेज उसकी ‘कैशबुक’ (रोकड़ बही) होती है। लेकिन आत्मा परियोजना डिंडोरी की कैशबुक को देखकर कोई भी ऑडिट अधिकारी अपना सिर पकड़ लेगा।
बिना बिल-वाउचर के लाखों का खर्च: प्रमाणित कैशबुक प्रतियों में किसी भी देयक (बिल) क्रमांक, वाउचर नंबर या मद (Head of Account) का उल्लेख ही नहीं किया गया है। सिर्फ मोटी रकम खर्च होने की प्रविष्टियां दर्ज कर दी गईं। इससे यह पूरी तरह से गुप्त है कि यह पैसा किस व्यक्ति या संस्था को, किस काम के बदले दिया गया。
विभागीय कर्मचारियों को रेवड़ियां: कैशबुक को पूरी तरह से अपूर्ण, अस्पष्ट और अनर्गल तरीके से संधारित किया गया था ताकि असलियत को छिपाया जा सके। इसमें विभागीय कर्मचारियों को ही नियमों के विरुद्ध जाकर हर महीने लाखों रुपयों का भुगतान किया जाता रहा, जिससे सांठगांठ की बू साफ तौर पर आती है。
आंकड़ों का मायाजाल: एक ही साल में बजट की दो अलग-अलग जानकारियां भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए विभाग ने झूठ का ऐसा जाल बुना कि वे खुद ही अपने बुने जाल में फंस गए। सूचना के अधिकार के तहत विभाग ने अलग-अलग तारीखों में दो ऐसे पत्र जारी किए, जो उनके झूठ को पूरी तरह बेनकाब करते हैं:
पहला पत्र (दिनांक 07.02.2022) इसमें बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में आत्मा योजना के तहत कुल 13.50 लाख रुपये का आवंटन मिला था और वर्ष 2021-22 में 3.50 लाख रुपये का आवंटन मिला, जिसे पूरी तरह खर्च कर दिया गया。
दूसरा पत्र (दिनांक 19.05.2022): ठीक तीन महीने बाद विभाग लिखता है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 में 80.00 लाख रुपये और वर्ष 2021-22 में 35.00 लाख रुपये का आवंटन मिला था और उसे संपूर्ण खर्च कर दिया गया。
सवाल यह उठता है कि:एक ही वित्तीय वर्ष के लिए सरकार से मिलने वाला बजट तीन महीने में कैसे बदल गया? 13.50 लाख सीधे 80 लाख कैसे हो गए, और 3.50 लाख की राशि अचानक 35 लाख में कैसे तब्दील हो गई? यह विरोधाभास साफ तौर पर दर्शाता है कि बड़े पैमाने पर वित्तीय हेरफेर चल रहा था और वास्तविक आंकड़ों को छुपाने के लिए आवेदक को आपराधिक रूप से गुमराह किया जा रहा था。
आवंटन से अधिक का खर्च और PFMS पोर्टल का बड़ा खुलासा
सरकारी नियमों में ‘जितनी चादर, उतने पैर’ यानी जितना आवंटन (बजट) मिले, उतना ही खर्च करने का नियम है। परंतु डिंडोरी कृषि विभाग ने तो चमत्कारी वित्तीय प्रबंधन का प्रदर्शन किया:
वर्ष 2020-21 का कौतुक: शासन के आवंटन आदेश के अनुसार, लगभग 11 घटकों में खर्च करने के लिए 4,99,11,000 रुपये (लगभग 5 करोड़) की भारी-भरकम राशि स्वीकृत थी। लेकिन कागजों पर व्यय केवल 1,53,920 रुपये (एक लाख तिरेपन हजार) दिखाया गया। यानी बजट होने के बाद भी किसानों के काम नहीं किए गए।
वर्ष 2021-22 का महाघोटाला:
इस वर्ष कुल प्राप्त आवंटन 451.11 करोड़ (दस्तावेजी संदर्भानुसार) था, जिसके विरुद्ध पी.एफ.एम.एस. (Public Financial Management System) पोर्टल की प्रतियों के अनुसार, संबंधितों को सीधे 276.53 लाख (2 करोड़ 76 लाख 53 हजार 541 रुपये) का भुगतान प्रदर्शित हो रहा है, जो कई बैंक खातों के माध्यम से संदिग्ध रूप से निकाला गया。प्राप्त आवंटन और बैंक अकाउंट प्रतियों के आधार पर खर्च की गई अत्यधिक राशियों में भारी विसंगतियां हैं, जो बिना वरिष्ठ अधिकारियों के संरक्षण और व्यापक भ्रष्टाचार के बिना असंभव है。
कागजी ‘फसल प्रदर्शन’ और लापता नीम तेल-स्प्रेयर पंप
आत्मा योजना का मुख्य उद्देश्य होता है किसानों के खेतों पर नई तकनीकों का प्रदर्शन (Crop Demonstration) करना, ताकि वे आधुनिक खेती सीख सकें। कागजों पर खरीफ के मौसम में 105 और रबी के मौसम में 70 फसल प्रदर्शन आयोजित किए गए, और प्रति किसान 4,000 रुपये का अनुदान भी बांट दिया गया। लेकिन जब धरातल पर इसकी पड़ताल की गई तो हकीकत कुछ और ही निकली:
लापता बीज का स्टॉक:
विभाग ने लिखित में दिया कि वर्ष 2021 में 6.30 क्विंटल धान बीज और वर्ष 2020-21 व 2021-22 में क्रमशः 28.00 क्विंटल और 128.45 क्विंटल गेहूं बीज का भंडारण किया गया था। लेकिन ये प्रदर्शन किस ग्राम में हुए, किन किसानों को यह बीज मिला, और बीज की वास्तविक मात्रा कहां गई? इसकी कोई जानकारी आज तक विभाग के पास उपलब्ध नहीं है।
कीट नियंत्रण में भी घोटाला:
फसल प्रदर्शन के दौरान कीट नियंत्रण के लिए 14 लीटर नीम का तेल (Neem Oil) और 14 स्प्रेयर पंप खरीदने की बात कही गई, जबकि विकासखंडवार लक्ष्य में 21 स्प्रेयर पंप दर्शाए गए। इन पंपों को किस दुकान से खरीदा गया, इनका बिल क्या था, और ये किस आदिवासी किसान के घर पहुंचे? इसके सारे दस्तावेज पूरी तरह से गायब हैं。
- ‘किसान खेत पाठशाला’ में फर्जीवाड़ा: किसानों को नहीं मिला साहित्य, अधिकारी डकार गए व्याख्यान राशि
किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए डिंडोरी जिले में कुल 35 किसान खेत पाठशालाओं के आयोजन के लिए शासन ने 10.29 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की थी। प्रति पाठशाला 29,414 रुपये का बजट निर्धारित था। लेकिन इस पवित्र योजना को भी भ्रष्टाचार की दीमक चाट गई:
कागजों पर सिमटी पाठशालाएं: 35 स्वीकृत पाठशालाओं के मुकाबले केवल 28 पाठशालाएं आयोजित करने का दावा किया गया। इन 28 पाठशालाओं में प्रति पाठशाला केवल 10,000 रुपये का मामूली खर्च दिखाकर खानापूर्ति की गई。
व्याख्यान राशि का आपसी बंदरबांट: नियमानुसार इन पाठशालाओं में कृषि वैज्ञानिकों और तकनीकी विद्वानों को व्याख्यान (Lectures) देने के लिए बुलाया जाना था। परंतु विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने किसी भी विशेषज्ञ को नहीं बुलाया। उन्होंने खुद ही कागजों पर 61 प्रशिक्षक खड़े किए, जिन्होंने 348 व्याख्यान दे डाले! प्रति व्याख्यान 400 रुपये की दर से 1,39,200 रुपये का मानदेय अधिकारियों और कर्मचारियों ने आपस में ही बांटकर डकार लिया。
फर्जी बैठक और भोजन व्यवस्था: कागजों पर दावा किया गया कि इन 28 स्थानों पर आयोजित पाठशालाओं में कुल 840 किसानों ने भाग लिया。उनके भोजन पर 1,51,200 रुपये और बैठक व्यवस्था की मजदूरी पर 9,000 रुपये सहित कुल 1,60,200 रुपये खर्च किए गए। पूरी व्यवस्था पर कुल 2,99,400 रुपये खर्च होना दिखाया गया, परंतु किसी भी जनप्रतिनिधि, ग्राम पंचायत या विकासखंड अधिकारी द्वारा इस कार्यक्रम का कोई भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया और न ही कोई वैध उपस्थिति रजिस्टर संधारित किया गया。
बची हुई राशि का रहस्य:सबसे बड़ा सवाल 8,23,592 रुपये(सवा आठ लाख से अधिक) की शेष बची राशि पर है। आशंका है कि फर्जी बिल-वाउचर और कूट रचित दस्तावेजों के सहारे इस पूरी बची राशि को अधिकारियों ने आपसी सांठगांठ से सीधे आहरित कर अपनी जेबों में भर लिया。
पर्यटन के नाम पर ‘किसान अध्ययन भ्रमण’ घोटाला
किसानों को देश और राज्य के उन्नत कृषि केंद्रों का दौरा कराने और नई तकनीकों से रूबरू कराने के लिए ‘कृषक अध्ययन भ्रमण योजना’ चलाई जाती है। डिंडोरी में इस योजना का उपयोग केवल सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने के लिए किया गया:
जिले के अंदर का भ्रमण: जिले के भीतर एक दिवसीय भ्रमण के लिए 70,000 रुपये स्वीकृत थे। विभाग ने केवल दो छोटे आयोजन कर 14,000 रुपये खर्च किए और शेष 56,000 रुपये का सीधे आपस में बंदरबांट कर लिया。
राज्य के अंदर का 5 दिवसीय भ्रमण: इस कार्य हेतु 1.40 लाख रुपये स्वीकृत थे। नियमानुसार रूट चार्ट बनाकर किसानों को पांच अलग-अलग जिलों में ले जाना था। परंतु मनोहर बुनकर (BTM) और पवन शर्मा (ATM, करंजिया) ने परियोजना संचालक अश्वनी झारिया के साथ मिलकर किसी एक विशेष स्थान पर फर्जी तरीके से कागजी आयोजन दिखाया और पूरी राशि का व्यक्तिगत उपयोग कर डाला राज्य के बाहर का भ्रमण:इसके लिए कुल 4.19 लाख रुपये का बजट स्वीकृत था। इसके लिए दो प्रभारी अधिकारी— मनोहर बुनकर (BTM, मेंहदवानी) और शविकास चौधरी (BTM, डिंडोरी) नियुक्त किए गए थे। आरटीआई के माध्यम से जब इस विदेश/अंतरराज्यीय भ्रमण का विवरण मांगा गया, तो विभाग पिछले 11 महीनों से इस जानकारी को दबाकर बैठा है, क्योंकि हकीकत में ऐसा कोई भ्रमण हुआ ही नहीं और पूरी राशि का गबन कर लिया गया है जो भी छायाप्रतियां दी गईं, वे इतनी धुंधली और अस्पष्ट हैं कि उनमें न तो तारीखें पढ़ी जा सकती हैं और न ही स्थान。
किसान मित्रों और किसान दीदियों’ के पारिश्रमिक पर डाका: कलेक्ट्रेट में गूंजे नारे
डिंडोरी जिले के कृषि विकास में रीढ़ की हड्डी की तरह काम करने वाले लगभग 443 किसान मित्रों और किसान दीदियों को भी इन भ्रष्ट अधिकारियों ने नहीं बख्शा। वर्ष 2021-22 में उनके कड़े परिश्रम के बदले शासन द्वारा जारी की गई 26.58 लाख रुपये (छब्बीस लाख अठावन हजार) की पारिश्रमिक राशि को अनैतिक और अवैध ढंग से आहरित कर लिया गया。
जब इन गरीब किसान मित्रों को अपने हक का पैसा नहीं मिला, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा।दिनांक 24/08/2022 को जिला कलेक्ट्रेट डिंडोरी में सैकड़ों की संख्या में किसान मित्रों और दीदियों ने एकत्रित होकर तत्कालीन प्रभारी उपसंचालक कृषि अश्वनी झारिया के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया और उन्हें तत्काल हटाने व जेल भेजने की मांग करते हुए जमकर नारेबाजी की, जिसकी खबरें स्थानीय समाचार पत्रों की सुर्खियां बनीं。 - परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) में करोड़ों का झोल
जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए संचालित परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) में तो विसंगतियों की सारी हदें पार हो गईं:
एक और विरोधाभासी आंकड़ा:
विभाग के पत्र दिनांक 07.02.2022 में कहा गया कि वर्ष 2021-22 में योजना संचालन के लिए 7.11 लाख रुपये मिले थे। वहीं, दिनांक 19.05.2022 के पत्र में इसी राशि को बढ़ाकर 711.671 लाख रुपये (7 करोड़ से अधिक) बता दिया गया।
असंभव खर्च का दावा सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग ने लिखित में स्वीकार किया कि उन्होंने इस योजना के तहत 2,38,60,178 रुपये (दो करोड़ अड़तीस लाख साठ हजार एक सौ अठहत्तर रुपये) खर्च किए हैं। सवाल यह उठता है कि जब वास्तविक आवंटन केवल 7.11 लाख था, तो दो करोड़ से अधिक का खर्च कैसे किया जा सकता है? यह पूरी तरह से एक कागजी और काल्पनिक खर्च है, जिसके पीछे बड़े वित्तीय गबन की पूरी संभावना है。
लापता पीजीएस (PGS) समूह और बची हुई राशि: वर्ष 2015 से 2019 के बीच जिले में कुल 310 (विभाग के अनुसार 313) पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम (PGS) समूहों का गठन किया गया था। इनके संचालन के लिए प्राप्त कुल2787.89 लाख के बजट में से 2428.9 लाख खर्च होना बताया गया, जबकि शेष बची 358.99 लाख रुपये (साढ़े तीन करोड़ से अधिक) की राशि कहां है, इसका विभाग के पास कोई जवाब नहीं है। धरातल पर इन समूहों के अस्तित्व और उनके खातों की कोई तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध नहीं है。 - कृषक संगोष्ठियों और स्टाफ ट्रेनिंग का फर्जीवाड़ा
कागजी संगोष्ठियां: वर्ष 2021-22 के तहत जिले में प्रति संगोष्ठी 15,000 रुपये के बजट से कुल 14 संगोष्ठियां आयोजित की जानी थीं इसके लिए भोजन, बैठक व्यवस्था, प्रशिक्षण और वाहन खर्च के नाम पर 30.78 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित था। परंतु विभाग ने शाहपुरा, बजाग, करंजिया, मेंहदवानी और समनापुर में केवल 5 छोटी संगोष्ठियां आयोजित कीं और उन पर महज 75,018 रुपये खर्च किए। शेष बचे 8,74,982 रुपये (पौने नौ लाख रुपये) को डकार लिया गया
डीपीओ स्टाफ ट्रेनिंग का फर्जीवाड़ा:
इसी तरह, दो डीपीओ स्टाफ प्रशिक्षण कार्यक्रमों के नाम पर सरकार से स्वीकृत 21,28,000 रुपये (इक्कीस लाख अठाईस हजार) की पूरी राशि को फर्जी बिलों और फर्जी संस्थानों के नाम पर आहरित कर पूरी तरह से खुर्द-बुर्द कर दिया गया。
कृषक समूह क्षमता प्रशिक्षण घोटाला:
जिले के 313 किसान समूहों को स्वरोजगार और आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रति समूह 10,000 रुपये की दर से 31,30,000 लाख रुपये का बजट आवंटित हुआ था。तत्कालीन प्रभारी उपसंचालक ने अपने मातहत कर्मचारियों के साथ मिलकर फर्जी प्रशिक्षण दस्तावेज, फर्जी फोटोग्राफ और कूट रचित बिल तैयार कर इस पूरी राशि का गबन कर लिया。इसी तरह उत्कृष्ट समूहों को मिलने वाली 1 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि और 3.5 लाख रुपये के किसान पुरस्कारों की राशि का भी कोई अता-पता नहीं है。 - सबसे बड़ा प्रहार: कृषि यंत्र और सामग्री वितरण में करोड़ों की संदिग्ध खरीदी घोटाले की अंतिम और सबसे बड़ी कड़ी है—कृषि यंत्रों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों और प्लास्टिक सामग्रियों की खरीदी, जो सीधे तौर पर ‘एमपी स्टेट एग्रो इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ (MP State Agro) की डिंडोरी शाखा के माध्यम से की गई थी। इस खरीदी में वित्तीय नियमों और भंडारा क्रय नियमों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया:
संदिग्ध खरीदी का पूरा लेखा-जोखा
| क्र.सं. | सामग्री का विवरण / योजना घटक | लक्षित क्षेत्र / विकासखंड | भुगतान की गई कुल राशि (रुपये में) | वर्तमान स्थिति / संदेह का आधार |
18 नग न्यू टू व्हील ट्रॉली (10’6’2), प्लास्टिक ड्रम, बकेट, मग आदि
जिले के सभी 07 विकासखंड | 1,34,83,336.72
(1.34 करोड़ से अधिक) | अत्यंत संदेहप्रद खरीदी; भौतिक सत्यापन और स्टॉक पंजी में प्रविष्टियां गायब हैं। प्लास्टिक सामग्री (85 लीटर क्षमता के ड्रम, 14 लीटर की बकेट, मग आदि) | करंजिया (6000 नग), डिंडोरी (10800), शाहपुरा (4800), अमरपुर (4800), मेंहदवानी (5000), बजाग (4800), समनापुर (4800) | 72,45,967.00
(72.45 लाख से अधिक) | कागजों पर भारी संख्या में वितरण दर्शाया गया है, लेकिन किसी भी ग्राम पंचायत के पास पावती उपलब्ध नहीं है। |
| 3 | न्यू टू व्हील ट्रैक्टर ट्रॉली | पांच विकासखंड: करंजिया (06 नग), डिंडोरी (03), शाहपुरा (03), अमरपुर (03), मेंहदवानी (03) | 22,99,891.26
(22.99 लाख से अधिक) | ट्रॉलियों के चेसिस नंबर और हितग्राही किसानों के नाम का कोई मिलान नहीं है। |
| 4 | लीव अर्थ वार्म पैकिंग (केंचुआ खाद/वर्मी कंपोस्ट किट सामग्री) | करंजिया (960 नग), डिंडोरी (1500), शाहपुरा (960), अमरपुर (960), मेंहदवानी (1080), बजाग (960), समनापुर (1080) | 39,37,500.00
(39.37 लाख से अधिक) | जैविक खेती के नाम पर पूरी तरह से कागजी खरीदी और फर्जी वितरण। |
| 5 | ‘सोनिक’ कंपनी के 14 हाईटेक प्रोजेक्टर | सात विकासखंडों के प्रशिक्षण केंद्रों हेतु (प्रति ब्लॉक 2 प्रोजेक्टर) | 5,56,976.00
(5.56 लाख से अधिक) | केंद्रीय भंडार रचना नगर भोपाल से सीधे खरीदी दिखाई गई, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों में ताले लटके हैं। |
कुल संदिग्ध सामग्री खरीदी राशि:
इस प्रकार केवल सामग्री और यंत्रों की खरीदी के नाम पर 2,75,23,670.98 रुपये (दो करोड़ पचहत्तर लाख से अधिक) का सीधे भुगतान कर दिया गया। यह पूरी सामग्री किन गांवों में गई, किस गरीब आदिवासी किसान के अंगूठे का निशान या हस्ताक्षर लेकर बांटी गई, इसकी रत्ती भर भी जानकारी कृषि विभाग के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है।जनता की मांग: उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच ही एकमात्र रास्ता
डिंडोरी जिले का यह कृषि घोटाला केवल शासकीय धन की बर्बादी नहीं है, बल्कि देश के अन्नदाता और सबसे पिछड़े जनजातीय समाज के साथ किया गया एक क्रूर मज़ाक है। जब शासन द्वारा भेजी गई विकास की राशि का उपयोग अधिकारी अपने निजी बंगले और बैंक खातों को भरने के लिए करने लगें, तो व्यवस्था का पतन निश्चित हो जाता है。
हालांकि, चौतरफा शिकायतों और कोर्ट-कचहरी के चक्करों के बाद आरोपी अधिकारी अश्वनी झारिया को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन यह कार्रवाई नाकाफ़ी है。 जिले के जागरूक किसानों और आम जनता की मध्यप्रदेश शासन से पुरजोर मांग है कि: - इस पूरे महाघोटाले की जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय तकनीकी जांच दल (SIT) का गठन किया जाए, जिसमें राज्य के बाहर के या निष्पक्ष आईएएस अधिकारी शामिल हों。
- गबन की गई पाई-पाई की वसूली दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों की निजी संपत्तियों को कुर्क करके की जाए。
- कूट रचित और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के जुर्म में संबंधितों के खिलाफ तत्काल भारतीय न्याय संहिता (BNS/IPC) की गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक एफआईआर (FIR) दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाए。
तभी डिंडोरी के आदिवासियों का कानून और सरकार पर भरोसा बहाल हो सकेगा और भविष्य में कोई भी अधिकारी जनता के पैसों पर डाका डालने की जुर्रत नहीं कर सकेगा। इस पूरे मामले की परतें जैसे-जैसे और खुलेंगी, कई और बड़े नामों के बेनकाब होने की पूरी उम्मीद है।
(RTI और माननीय न्यायालय में प्रस्तुत आधिकारिक दस्तावेजों के इनपुट्स पर आधारित)
