विशेष भोज के फरमान से मिड डे मील समूह बेहाल, कर्ज के बोझ तले दबे समूह

Revanchal
5 Min Read

गैस नहीं, बजट नहीं, फिर कैसे बनेगा बच्चों का भोजन?

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।मंडला जिले में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के बीच अब मध्यान्ह भोजन (मिड डे मील) योजना भी गंभीर संकट से जूझती नजर आ रही है। शासन द्वारा बार-बार “विशेष भोज” आयोजित करने के आदेश तो जारी किए जा रहे हैं, लेकिन इसके लिए अलग से बजट उपलब्ध नहीं कराया जा रहा। नतीजतन बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने वाले स्व-सहायता समूह आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई समूह कर्ज लेकर विशेष भोज कराने को मजबूर हैं, जबकि दूसरी ओर रसोई गैस की उपलब्धता न होने से नियमित भोजन बनाना भी चुनौती बन गया है।

विशेष भोज का आदेश, लेकिन भुगतान का कोई प्रावधान नहीं
जानकारी के अनुसार नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के अवसर पर 1 अप्रैल को विशेष भोज आयोजित कराया गया था। अब 16 जून से स्कूल खुलने पर फिर से विशेष भोज कराने के आदेश जारी किए गए हैं। समूह संचालकों का कहना है कि शासन केवल आदेश जारी कर देता है, लेकिन विशेष भोज के लिए अतिरिक्त राशि नहीं देता। ऐसे में हर बार अतिरिक्त खर्च समूहों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है।


समूहों का आरोप है कि योजना का उद्देश्य बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है, लेकिन बिना आर्थिक प्रावधान के बार-बार विशेष भोज का दबाव बनाना उनके लिए आर्थिक शोषण जैसा बन गया है। लगातार बढ़ती महंगाई के बीच खाद्य सामग्री की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं, ऐसे में अतिरिक्त व्यय उठाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।

रसोई गैस के बिना कैसे पकेगा भोजन?

मामले का दूसरा गंभीर पहलू रसोई गैस की अनुपलब्धता है। कई समूहों को अब तक गैस कनेक्शन संबंधी आवश्यक कार्ड या स्वीकृतियां नहीं मिल सकी हैं। इसके कारण गैस एजेंसियां नियमित रूप से सिलेंडर उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। समूहों का कहना है कि जब गैस ही उपलब्ध नहीं होगी तो हजारों बच्चों के लिए भोजन कैसे तैयार किया जाएगा।
समूह संचालकों ने मांग की है कि स्कूलों में संचालित मध्यान्ह भोजन योजना के लिए गैस एजेंसियों को विशेष निर्देश जारी किए जाएं और समूहों को प्राथमिकता के आधार पर सिलेंडर उपलब्ध कराया जाए। उनका कहना है कि प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा न तो समूहों को भुगतना चाहिए और न ही स्कूली बच्चों को।

शिक्षा व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल

जिले में पहले से ही शिक्षकों की मुख्यालय से अनुपस्थिति और शैक्षणिक गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में मध्यान्ह भोजन योजना में पैदा हो रहा यह नया संकट सरकारी दावों की पोल खोलता दिखाई दे रहा है। एक ओर सरकार स्कूलों में नामांकन बढ़ाने और बच्चों को बेहतर सुविधाएं देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर भोजन व्यवस्था संभालने वाले समूह मूलभूत संसाधनों और भुगतान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


प्रशासन की चुप्पी से बढ़ रहा असंतोष
समूहों का कहना है कि यदि शासन को विशेष अवसरों पर विशेष भोज कराना है तो उसके लिए अलग बजट निर्धारित किया जाए। केवल आदेश जारी कर जिम्मेदारी समूहों पर डाल देना न्यायसंगत नहीं है। लगातार बढ़ते आर्थिक दबाव और गैस संकट के कारण समूहों में भारी आक्रोश व्याप्त है।


सवाल जो जवाब मांगते हैं
जब विशेष भोज के लिए अलग बजट नहीं है तो बार-बार आदेश क्यों?
रसोई गैस की व्यवस्था किए बिना भोजन बनाने का दबाव क्यों?
क्या योजनाओं का बोझ अब गरीब स्व-सहायता समूहों के कंधों पर डाला जा रहा है?
आखिर बच्चों के पोषण से जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषय पर प्रशासन कब जागेगा?


मंडला में मिड डे मील योजना की जमीनी हकीकत यह संकेत दे रही है कि कागजों पर चल रही व्यवस्थाएं धरातल पर संसाधनों के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ रही हैं। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो इसका सीधा असर हजारों स्कूली बच्चों के पोषण और शिक्षा दोनों पर पड़ सकता है।

👁️ 8 views Views
Share This Article
Translate »