डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों की प्रतिबद्धता का संकल्प दोहराया
डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी संस्मरण पखवाड़ा के तहत हुआ कार्यकर्ता सम्मेलन
रेवांचल टाइम्स सौसर
भारतीय जनता पार्टी ने अपने आराध्य, जनसंघ के संस्थापक, वैचारिक आधार देनेवाले शिक्षाविद डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125 वीं जन्मजयंती मनाई।। डा मुखर्जी के 125 जन्मदिन के उपलक्ष्य में भाजपा ने पूरे देश में 23 जून से 6 जूलाई तक संस्मरण पखवाड़ा मनाने का निर्णय किया।। उसके अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये गये ।।आज उसी कड़ी में कार्यकताओं का जिला सम्मेलन आयोजित किया गया।।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष संदीप मोहोड ने की। डा मुखर्जी के जीवन उनके द्वारा राष्ट्रीय परिदृश्य में किये गये कार्यों और उनके विचारो को कार्यकताओं के सम्मुख प्रस्तुत किया गया।भाजपा बनाने और उसको वैचारिक आधार देने और उस एक राष्ट की कल्पना को आकार देने वाले विचारधारा को कार्यकताओं को बताया गया।।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में विलास घोंघे ने उनके जीवन और पहली नेहरू सरकार में योगदान, उनके द्वारा लिये गये निर्णय ,जो काम किये उसके बारे में जानकारी दी।।कैसे उन्होंने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के लिए उघोग विभाग में काम किया।।कैसे उन्होंने संविधान सभा में अपनी सहभागिता की और कई महत्वपूर्ण निर्णय में भूमिका रही।।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में मंडल अध्यक्ष गगन घटकडे ने बताया कैसे उन्होंने काश्मीर के लिए अपना प्राण न्यौछावर कर दिया।। उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए नेहरू सरकार से अलग होकर राष्ट्रीय एकता और एकात्मकता का अभियान चलाया जो बाद में जनसंघ और 1980 में भाजपा का विचार और सिद्धांत बना।
जिला अध्यक्ष संदीप मोहोड ने कार्यकताओं को बताया कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मतलब किसी धर्म या संप्रदाय के अनुसार देश नहीं चलेगा देश चलेगा तो भारत की परंपरा के सिद्धांत पर , भारत की आस्था पर चलेगा।
नेहरू की तुष्टिकरण और काश्मीर की दोहरी निति से असहमत होकर उन्होंने एक राष्ट्रीय पहचान के लिए मंत्री पद त्याग कर दिया। उन्होंने हमें वो विचार दिए जो आज भाजपा को वट वृक्ष बना दीये।।आज हम भारत के कोने कोने में जन-जन तक पहुच रहे हैं तो उसका कारण है उनके द्वारा दिया गया राष्ट्रवाद का बीज मंत्र,, राष्ट प्रथम की भावना,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आत्मसात।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नरेंद्र परमार ने उनके राजनीतिक जीवन यात्रा पर प्रकाश डाला।
परमार ने बताया कैसे उनका नेहरू सरकार से उनकी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और काश्मीर मुद्दे को लेकर विरोध हुआ। तब उन्होंने कांग्रेस सरकार से अलग होकर कांग्रेस का विरोध किया। कांग्रेस का विरोध उस समय बड़ी बात थी।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मदद से जनसंघ की स्थापना की राष्ट्रवाद का विचार दिया।उस समय हमारी विरोधी कांग्रेस हमारा उपहास उड़ाते थे। दीपक चुनाव चिन्ह का मज़ाक़ उड़ाया। परंतु आज उन्हीं विचारों ने हमे विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनाया । हमारा कार्यकर्ता वैचारिक आधार पर जुड़ा है, हम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारधारा के कार्यकता है।
उनके प्रखर राष्टवाद की ही ताकत है हम केंद्र से लेकर पंचायत तक लोकप्रिय है शासन में है,और शासन के माध्यम से राष्ट सेवा कर रहें।उनकी त्याग तपस्या और बलिदान के कारण ही हम यहां तक पहुंचे हैं।
मुखर्जी कश्मीर में धारा 370 का विरोध नहीं करते और राष्ट्रीय अखंडता की बात नहीं करते उसके लिए बलिदान नहीं देते तो क्या आज हम कश्मीर को भारत का पूर्ण रूप से अभिन्न अंग बना पाते ,,शायद नहीं । आजाद भारत के पहले बलिदानी है डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी। राष्ट के लिए अतुलनीय योगदान दिया मुखर्जी ने।
उन्होंने नेहरू लियाकत समझौते का विरोध कर तुष्टिकरण की नीति का विरोध किया।। हिंदू धर्म संप्रदाय के लोगों के अधिकार के संरक्षण का काम किया।
हम सब कार्यकताओं की जिम्मेदारी है इन सभी प्रेरणा पुंज के बताए मार्ग पर चले ।।राष्ट प्रथम के लिए कर्तव्य करें।अखंड भारत के लिए प्रतिबद्ध रहें।।इनके जीवन से जितना ज्ञान अर्जित कर सकते हैं,करना चाहिए। भारत को विकसित, आत्मनिर्भर बनाने में उनके विचार ही हमें आगे ले जाएंगे।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से पूर्व राज्य मंत्री नानाभाऊ मोहोड , मोरेश्वर मर्सकोले, संतोष जैन,राजेन्द्र भक्ते, वैशाली महाले, हरीश बत्रा, नगरपालिका पांढुर्णा अध्यक्ष संदीप घाटोडे, नगर पालिकाध्यक्ष सौसर श्रीमती सुरेखा इंद्रचंद डागा समेत सभी जिला पदाधिकारी,सभी मंडल अध्यक्ष , मंडल पदाधिकारी, सभी मोर्चों के पदाधिकारी, एवं बूथ स्तर के कार्यकर्ता उपस्थित रहे।।
