जहां पानी होना था, वहां लहलहा रही खेती लाखो की जल संरक्षण योजनाओं पर सवाल, स्टाप डेम बना भ्रष्टाचार का स्मारक

Revanchal
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रेवांचल टाइम्स मोहगांव मंडला
एक ओर केंद्र और राज्य सरकार लगातार बढ़ते तापमान, गिरते भू-जल स्तर और जल संकट से निपटने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर अमृत सरोवर, खेत तालाब, कुएं, चेक डेम और स्टाप डेम जैसी जल संरक्षण योजनाओं का निर्माण करा रही हैं। दूसरी ओर मंडला जिले में इन योजनाओं की जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। हालात ऐसे हैं कि जहां पूरे वर्ष पानी का संग्रह होना चाहिए था, वहां आज किसान खेती कर रहे हैं। यह दृश्य केवल विफल योजना का नहीं, बल्कि सरकारी धन की बर्बादी और कथित भ्रष्टाचार की कहानी बयां करता है।


ताजा मामला जनपद पंचायत मोहगांव की ग्राम पंचायत मोहगांव के मंगलू बैगा टोला में निर्मित स्टाप डेम का सामने आया है। इस स्टाप डेम का उद्देश्य वर्षा जल को रोककर भू-जल स्तर बढ़ाना, सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराना तथा गर्मी के दिनों में जल संकट से राहत देना था। लेकिन निर्माण के असल उद्देश्य पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस स्थान पर पूरे वर्ष पानी भरा रहना चाहिए था, वहां आज फसलें लहलहा रही हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि स्टाप डेम अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है।


सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार डेम में पानी रोकने के लिए लगाए जाने वाले प्लेट अथवा गेट या तो लगाए ही नहीं गए या फिर निर्माण के बाद गायब हो गए। परिणामस्वरूप बारिश का पानी बिना रुके बह जाता है और डेम केवल सीमेंट-कंक्रीट का ढांचा बनकर रह गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि डेम में वास्तव में पानी रुकने लगे तो निर्माण कार्य में हुई कथित अनियमितताओं और घटिया गुणवत्ता की पोल खुल जाएगी।


जानकारों का कहना है कि जिले में ऐसे कई स्टाप डेम हैं, जहां लाखो रुपये खर्च किए गए, लेकिन आज उनमें पानी की एक बूंद तक दिखाई नहीं देती। कहीं निर्माण गुणवत्ता इतनी खराब है कि पहली ही बारिश में संरचनाएं जवाब दे सकती हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन निर्माण कार्यों की तकनीकी जांच किसने की और गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले जिम्मेदार अधिकारी किस आधार पर भुगतान करते रहे।


मंगलू बैगा टोला का यह स्टाप डेम अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों का कहना है कि यदि यह जल संरक्षण योजना सफल होती तो आसपास के किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलता, पशुओं को पेयजल उपलब्ध होता और भू-जल स्तर में भी सुधार आता। लेकिन वर्तमान स्थिति में वहां खेती हो रही है, जो स्वयं इस योजना की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण मानी जा रही है।
मामला केवल स्टाप डेम तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत मोहगांव में वित्तीय अनियमितताओं के भी आरोप सामने आ रहे हैं। पंचायत दर्पण पोर्टल पर कई ऐसे बिल दिखाई दे रहे हैं जिन्हें ग्रामीण अधूरे और संदिग्ध बता रहे हैं। आरोप है कि तथाकथित बिलों” के माध्यम से लगातार भुगतान किया जा रहा है। यदि इन भुगतानों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।


सूत्रों के अनुसार मोहगांव माल क्षेत्र में मनरेगा के तहत कथित रूप से फर्जी जॉब कार्ड बनाकर सरकारी राशि का भुगतान किया गया। आरोप है कि जिन लोगों ने कार्य ही नहीं किया, उनके नाम से मजदूरी का भुगतान दर्शाया गया। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सीधे-सीधे सरकारी धन के दुरुपयोग और फर्जीवाड़े का मामला होगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि इन सभी मामलों में पंचायत के सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक तथा संबंधित उपयंत्री की मिलीभगत से सरकारी राशि का बंदरबांट किया जा रहा है। लोगों का कहना है कि कागजों में विकास कार्य पूरे दिखा दिए जाते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर वास्तविकता बिल्कुल अलग है।
जल संरक्षण जैसी योजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण कराना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित करना है। लेकिन यदि निर्माण केवल भुगतान निकालने का माध्यम बन जाए तो इससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान होता है बल्कि आम जनता भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रह जाती है। बढ़ते तापमान और लगातार गिरते जल स्तर के बीच ऐसे स्टाप डेमों का निष्प्रभावी होना भविष्य के लिए चिंता का विषय है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि मंगलू बैगा टोला के स्टाप डेम सहित जनपद पंचायत मोहगांव क्षेत्र में बने सभी स्टाप डेमों और जल संरक्षण संरचनाओं की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए। साथ ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान प्रक्रिया, उपयोग किए गए निर्माण सामग्री, माप पुस्तिका (एमबी), तकनीकी स्वीकृति तथा कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र की भी निष्पक्ष जांच हो।
यदि जांच में किसी भी अधिकारी, कर्मचारी, सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक, उपयंत्री या ठेकेदार की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं में कार्रवाई की जानी चाहिए तथा सरकारी धन की वसूली भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार जल संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो आखिर स्टाप डेम में पानी क्यों नहीं है जहां जलाशय होना चाहिए था, वहां खेती कैसे हो रही है। क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी इन निर्माण कार्यों का वास्तविक निरीक्षण कर सच्चाई जनता के सामने लाएंगे या फिर फाइलों में पानी भरा दिखाते रहेंगे।

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