रक्षाबंधन केवल त्योहार नहीं, बहनों के सम्मान की प्रतिज्ञा है : सुश्री सरोज कंसारी

Revanchal
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रिश्तों की दुनिया में अनमोल उपहार है प्रेम का यह रक्षाबंधन

रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम, विश्वास और अटूट बंधन का पर्व है। यह महज कलाई पर राखी बांधने और उपहार देने की रस्म नहीं, बल्कि बहन के सम्मान, सुरक्षा और उसके सुख-दुःख में सदैव साथ खड़े रहने का संकल्प है।

जीवन में अनेक रिश्ते बनते हैं। कुछ समय और परिस्थितियों के साथ कमजोर पड़ जाते हैं तो कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो हर कठिनाई के बावजूद जीवनभर साथ चलते हैं। भाई-बहन का रिश्ता इन्हीं अनमोल रिश्तों में से एक है। बचपन की नोंक-झोंक, रूठना-मनाना, साथ खेलना और छोटी-छोटी खुशियों को साझा करना इसी रिश्ते को खास बनाता है।

समय गुजरता है, बचपन पीछे छूट जाता है और बहन विवाह के बाद ससुराल चली जाती है। लेकिन क्या घर बदल जाने से बहन पराई हो जाती है? यह सवाल आज भी समाज के सामने खड़ा है। जिस बेटी ने उसी घर में जन्म लिया, उसी आंगन में पली-बढ़ी, उसी परिवार की खुशियों में अपनी खुशियां तलाश कीं, उसे विवाह के बाद अपने ही मायके में परायापन महसूस हो—इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है?

अक्सर बहन अपने अधिकारों की मांग नहीं करती। वह भाई की खुशियों के लिए अपना हिस्सा तक छोड़ देती है। लेकिन उसे सबसे ज्यादा पीड़ा तब होती है, जब भावनात्मक रूप से वही भाई उससे दूर हो जाता है, जिसके साथ उसने बचपन की अनगिनत यादें साझा की थीं। इसलिए रक्षाबंधन हमें केवल राखी की डोर नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनापन बनाए रखने का संदेश देता है।

आज बेटा-बेटी समानता की बात होती है। कानून भी बेटियों को समान अधिकार देता है। ऐसे समय में जरूरत है कि भाई अपनी बहन को केवल त्योहार के दिन नहीं, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर सम्मान और अपनापन दें। रिश्ते औपचारिकता से नहीं, भावनाओं से मजबूत होते हैं।

राखी की डोर में छिपा है सुरक्षा का संकल्प

रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हर भाई यह संकल्प ले कि उसकी ही नहीं, समाज की हर बेटी और बहन सुरक्षित रहे। किसी महिला को बुरी नजर से न देखना, उसके साथ अभद्र टिप्पणी न करना और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा या छेड़छाड़ के खिलाफ आवाज उठाना भी रक्षाबंधन की भावना का हिस्सा होना चाहिए।

समाज में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा, जहां किसी बेटी को सड़क, बाजार, स्कूल, कॉलेज या किसी सुनसान रास्ते पर असुरक्षा महसूस न हो। युवाओं को आगे आकर ऐसा सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिसमें किसी महिला के साथ अन्याय होने पर लोग तमाशबीन बनने के बजाय उसकी सहायता के लिए खड़े हों।

हर बहन में अपनी बहन की छवि और हर बेटी में अपने परिवार की बेटी का सम्मान देखने की मानसिकता विकसित करनी होगी। तभी रक्षाबंधन की राखी वास्तव में सुरक्षा और सम्मान की डोर बनेगी।

भाई-बहन दोनों निभाएं रिश्ते की मर्यादा

जहां भाई का दायित्व है कि वह बहन की सुरक्षा, सम्मान और खुशियों के लिए सदैव खड़ा रहे, वहीं बहन का भी दायित्व है कि वह भाई के स्नेह और विश्वास का सम्मान करे। किसी के बहकावे में आकर ऐसा कदम न उठाए, जिससे परिवार और रिश्तों को गहरा आघात पहुंचे।

रिश्ते विश्वास से बनते हैं और विश्वास संवाद से मजबूत होता है। इसलिए भाई-बहन के बीच खुला संवाद, एक-दूसरे की भावनाओं की समझ और परिवार के प्रति जिम्मेदारी बेहद जरूरी है।

भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती है। यदि पूरा समाज एक परिवार की भावना से आगे बढ़े, तो किसी बेटी को अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। हर व्यक्ति दूसरे की बहन-बेटी की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझे, यही इस पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।

रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि राखी की डोर कच्ची जरूर होती है, लेकिन उसमें बंधे भाव बेहद मजबूत होते हैं। यह डोर केवल कलाई पर नहीं बंधती, बल्कि दिलों को जोड़ती है।

आइए इस रक्षाबंधन पर केवल राखी न बांधें, बल्कि एक संकल्प भी लें—बहन का सम्मान करेंगे, बेटी की सुरक्षा करेंगे, महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे और रिश्तों में कभी परायापन नहीं आने देंगे।

यही रक्षाबंधन की सच्ची भावना है और यही उस पवित्र डोर का वास्तविक सम्मान भी।

— सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री, लेखिका एवं अध्यापिका
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका, नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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