करोड़ों के विकास के बीच बदहाली का शिकार मंदिर, 8वीं पीढ़ी से पुजारी परिवार कर रहा सेवा
दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मैहर। माँ शारदा की पवित्र नगरी मैहर आज विकास की नई तस्वीर लिख रही है। धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार से लेकर आधुनिक सुविधाओं तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन इसी मैहर में एक ऐसी प्राचीन धार्मिक धरोहर भी मौजूद है, जो आज विकास की दौड़ में पीछे छूट गई है। हरनामपुर स्थित प्राचीन जगन्नाथ मंदिर प्रशासनिक अनदेखी और उपेक्षा के कारण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
विडंबना यह है कि जहां मैहर के अन्य धार्मिक स्थलों को विकास की सौगात मिल रही है, वहीं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पवित्र प्रतिमाओं वाला यह प्राचीन मंदिर आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में खड़ा है।
राजशाही काल से स्थापित होने का दावा, 8वीं पीढ़ी कर रही पूजा
मंदिर के पुजारी विजय कुमार दीक्षित के अनुसार यह मंदिर राजशाही काल से स्थापित है और उनका परिवार लगातार 8वीं पीढ़ी से भगवान जगन्नाथ की सेवा और पूजा-अर्चना करता आ रहा है। मंदिर से जुड़े बुजुर्गों और पुजारी परिवार का दावा है कि इस मंदिर की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी।
मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की प्रतिमाएं पुरी धाम की परंपरा के अनुरूप विराजमान हैं। प्रतिवर्ष यहां रथयात्रा भी निकाली जाती है। धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी इतनी बड़ी विरासत होने के बावजूद मंदिर का विकास न होना कई सवाल खड़े करता है।
रास्ते के विवाद में फंसी मंदिर की राह
मंदिर की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है स्वतंत्र रास्ते का अभाव। बताया जाता है कि जगन्नाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए वर्तमान में श्रीराम मंदिर परिसर से होकर जाना पड़ता है। मंदिर के लिए स्वतंत्र रास्ता उपलब्ध नहीं है।
स्थानीय स्तर पर बताया जा रहा है कि रास्ते के निर्माण के लिए श्रीराम मंदिर की ओर से करीब 10 फीट भूमि उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण मामला लंबे समय से अटका हुआ है। सवाल यह है कि धार्मिक आस्था से जुड़े दो स्थलों के बीच रास्ते जैसी बुनियादी समस्या आखिर कब तक बनी रहेगी?
यदि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इच्छाशक्ति दिखाएं तो आपसी समन्वय से इस विवाद का समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन अब तक ऐसा कोई ठोस प्रयास नजर नहीं आया, जिसके कारण मंदिर का विकास भी प्रभावित हो रहा है।
8वीं पीढ़ी से सेवा, फिर भी सरकारी सहयोग नदारद
मंदिर की स्थिति का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पुजारी विजय कुमार दीक्षित का परिवार आठ पीढ़ियों से मंदिर की सेवा करता आ रहा है, लेकिन उनके अनुसार उन्हें किसी प्रकार का नियमित सरकारी मानदेय या मंदिर रखरखाव के लिए पर्याप्त सरकारी सहयोग नहीं मिल रहा।
मंदिर का संचालन पुजारी परिवार और श्रद्धालुओं के सहयोग के भरोसे चल रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस धार्मिक स्थल की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही हो, उसकी जिम्मेदारी केवल एक परिवार के भरोसे क्यों छोड़ दी गई?
न पानी की समुचित व्यवस्था, न शौचालय, न शेड
मंदिर परिसर में आधुनिक सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई देता है। स्थानीय प्रयासों से बिजली की व्यवस्था जरूर हुई है, लेकिन पीने का पानी, शौचालय, श्रद्धालुओं के बैठने के लिए पर्याप्त शेड और चारदीवारी जैसी मूलभूत सुविधाएं अब भी जरूरत बनी हुई हैं।
धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करने वाले जिम्मेदारों के लिए यह मंदिर एक बड़ा सवाल है। यदि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थलों को ही बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो धार्मिक पर्यटन को गति देने के दावे कितने सार्थक हैं?
विकास के दावों के बीच उपेक्षा का सवाल
मैहर तेजी से धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। ऐसे में हरनामपुर का यह प्राचीन जगन्नाथ मंदिर भी धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि प्रशासन इसकी सुध ले।
स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि मंदिर के लिए स्वतंत्र रास्ते की समस्या का समाधान, मूलभूत सुविधाओं का विकास, परिसर की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण तथा पुजारी परिवार को उचित सम्मान और सहयोग दिया जाना चाहिए।
अब जिम्मेदारों की ओर टिकी निगाहें
सवाल किसी एक मंदिर के विकास का नहीं, बल्कि एक प्राचीन धार्मिक विरासत को बचाने का है। यदि मंदिर वास्तव में राजशाही काल की विरासत है और आदि शंकराचार्य से जुड़ी इसकी स्थापना की परंपरा है, तो प्रशासन को इसकी ऐतिहासिकता और धार्मिक महत्व की जांच कराकर आवश्यक संरक्षण की दिशा में कदम उठाना चाहिए।
मैहर में विकास की गंगा बह रही है तो उसका एक किनारा यह प्राचीन जगन्नाथ मंदिर भी होना चाहिए। आखिर कब तक भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर उपेक्षा की छाया में खड़ा रहेगा?
स्थानीय श्रद्धालुओं की मांग है कि जिला प्रशासन मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वतंत्र मार्ग, पेयजल, शौचालय, शेड, चारदीवारी सहित आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करे और मंदिर के संरक्षण एवं विकास की ठोस कार्ययोजना तैयार करे।
यदि समय रहते पहल हुई तो हरनामपुर का यह प्राचीन जगन्नाथ मंदिर न केवल अपनी खोई पहचान वापस पा सकता है, बल्कि मैहर के धार्मिक पर्यटन में ‘छोटी पुरी’ के रूप में एक नई पहचान भी बना सकता है।
