
पंडित संदीप ज्योतिषी
दैनिक रेवांचल टाईम्स – मध्य प्रदेश का जलेश्वर महादेव मंदिर अमरकंटक मंदिर मेकल पहाड़ियों की अमरकंटक श्रृंखला में स्थित एक प्रतिष्ठित तीर्थ स्थल है यह पवित्र नदी मां नर्मदा का उद्गम स्थल है यहां दर्शन करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है मंदिर अपने आप में प्राचीन भारतीय वास्तु कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जिसमें जटिल नक्काशी और दिव्य मूर्तियां हैं मंदिर में एक अनोखा काले रंग का जलेश्वर महादेव शिवलिंग है जो ज्वाला छोड़ता है इस मंदिर के निर्माण के पीछे की क्यों किव दती कहती है कि जब भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर को तीन टुकड़ों में मार दिया तो उनमें से एक हिस्सा नर्मदा कुंड के पास गिरा जो बाद में भगवान शिव का आसान बन गया कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने एक बाण से राक्षस त्रिपुरासुर को नष्ट कर दिया था इसके बाद इसी जगह पर शिवजी ने अपनी पुत्री नर्मदा को शास्त्र सौंप दिए थे ।
बाणासुर के वध से से प्रकट हुआ ज्वालेश्वर महादेव शिवलिंग
पंडित संदीप ज्योतिषी ने बताया कि शक्ति के घमंड में बाणासुर उत्पात मचाने लगा तब भगवान शिव ने पिनाक धनुष से और अघोर नाम के बाढ़ से बाणासुर पर प्रहार किया इस पर बाणासुर अपने पूज्य शिवलिंग को सर पर धारण कर महादेव की स्तुति करने लगा उसकी स्तुति से शिवजी प्रसन्न हुए बाण से तिरुपुर के तीन खंड हुए और नर्मदा के जल में गिर गए वहां से जलेश्वर नाम का तीर्थ प्रकट हुआ भगवान शिव के बाढ़ से बचा हुआ ही यह शिवलिंग बाण लिंग कहलाया
जोहिला नदी का यही है उद्गम स्थल
पवित्र धाम अमरकंटक से तीन नदियों का उद्गम स्थल है नर्मदा सोन नदी और जोहिला का उद्गम स्थल जलेश्वर महादेव मंदिर के निकट है ऐसा कहा जाता है कि गंगोत्री का जल रामेश्वर में चढ़ाने से जितना पुण्य फल मिलता है उतना ही फल मां नर्मदा कुंड का जल ज्वालेश्वर महादेव में चढ़ाने से मिलता है
शिव महापुराण में भी इस स्थान का वर्णन मिलता है शिव महापुराण के अनुसार राक्षस तारकासुर के तीन पुत्र थे तीनों ने ब्रह्मा की तपस्या करके त्रिपुर की रचना कराई और उनके आतंक से पीड़ित होकर देवता भगवान शिव के पास गए भगवान शिव ने क्रोध में तीनों पूरो को नष्ट कर दिया और एक पूर जलती हुई ज्वाला के रूप में धरती पर गिरा ज्वाला की इस भयावहता को देख लगा कि सृष्टि का विनाश हो जाएगा ऐसे में देवताओं ने भगवान शिव से ज्वाला को शांत करने की प्रार्थना की शिवजी ने उस ज्वाला को जल के रूप में परिवर्तित किया तो यह जोहिला नदी के रूप में यहां से निकली
पूरी होती है मनोकामना
पंडित संदीप ज्योतिषी ने बताया कि कहते हैं मां नर्मदा कुंड का जल लाकर ज्वालेश्वर महादेव को अर्पण करने से सभी मनोकामना पूरी होती हैं सावन के महीने में यहां नर्मदा जल चढ़ाने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और जलेश्वर महादेव से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं
कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं इस मंदिर को स्थापित किया था पुराणों में इस स्थान को महा रूद्र मेरु कहा गया है यहीं से अमरकंटक की तीसरी नदी जोहिला की उत्पत्ति होती है इसलिए जलेश्वर महादेव मंदिर की बहुत अधिक मान्यता है यहां स्थापित बाण लिंग की कथा का जिक्र स्कंद पुराण में है इस बाण लिंग पर दूध व जल अर्पित करने से सभी पाप और दुखों का नाश हो जाता है
स्कंद पुराण के अनुसार बली का पुत्र बाणासुर अत्यंत बलशाली और शिव भक्त था बाणासुर ने भगवान शिव की तपस्या कर वर मांगा कि उसका नगर दिव्य और अजे य हो भगवान शिव को छोड़कर कोई और इस नगर में प्रवेश न कर सके इसी तरह बाणासुर ने ब्रह्मा और विष्णु भगवान से भी वर प्राप्त किया तीन पूर का स्वामी होने से वह त्रिपुर कहलाया।
ज्वालेश्वर मंदिर के गर्भ ग्रह में स्थापित शिवलिंग
