आदेश में MVU को रोज 5 केस अटेंड करने की हिदायत, फिर सवाल—जिम्मेदारी तय करने वाला खुद नियमों की जांच के दायरे में क्यों नहीं?
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।
आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले में सरकारी योजनाओं और शासन के आदेशों का लाभ समय पर आम जनता तक पहुंचाने के दावे तो खूब किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। अब पशुपालन विभाग से सामने आए एक दस्तावेज ने विभाग की कार्यप्रणाली और उसके जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
10 अगस्त 2026 को पशुपालन एवं डेयरी विभाग के उपसंचालक द्वारा जारी पत्र में मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के दौरान चलित पशु चिकित्सा इकाइयों (MVU) के कार्यों की समीक्षा और निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। पत्र में जिले की सभी चलित पशु चिकित्सा इकाइयों के स्टाफ को प्रतिदिन कम से कम 5 केस अटेंड करने तथा 5 एआई (कृत्रिम गर्भाधान) कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश का पालन नहीं करने पर आगामी माह का वेतन रोकने और सेवा से पृथक करने की कार्रवाई की चेतावनी तक दी गई है।
यानी नीचे काम करने वाले कर्मचारियों के लिए आदेश और कार्रवाई का डंडा पूरी तरह तैयार है। लेकिन इसी विभाग के मुखिया के शासकीय आवास में ऐसी गायें नजर आने का दावा सामने आया है, जिस पर टैग नहीं है।कानो में लगाये जाने वाले ये टैग किसी पशु का पहचान पत्र होते हैं कि मालिक कौन है ,उसका पता क्या है और इलाज संबंधित जानकारी के साथ साथ पशु पालकों को इसी आधार पर बैंक से kcc लोन भी मिलता है ,जिसे हम किसान क्रडिट कार्ड भी कहते हैं ।अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह गाय किसकी है? क्या यह विभागीय व्यवस्था से संबंधित है? यदि हां, तो इसकी पहचान और रिकॉर्ड क्या है? और यदि यह निजी पशु है तो शासकीय आवास में उसके रखरखाव की स्थिति क्या है?
बिना टैग की गाय ने खोल दिए कई सवाल
पशुपालन विभाग द्वारा समय-समय पर पशुपालकों को विभिन्न योजनाओं के माध्यम से गाय-भैंस एवं अन्य पशुधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाती रही है। ऐसे में किसी शासकीय परिसर अथवा अधिकारी के आवास पर बिना टैग का पशु दिखाई देना महज एक छोटी बात मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यहां सवाल सीधे किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और पारदर्शिता का है।
गायें किसकी है?
कहां से आई? क्या इसका टैग और विभागीय रिकॉर्ड उपलब्ध है?
यदि विभागीय योजना से संबंधित है तो लाभार्थी कौन है?
और यदि निजी पशु है तो शासकीय आवास में उसे रखने की अनुमति और व्यवस्था क्या है?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब विभाग को देना चाहिए, ताकि किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश न रहे।
योजनाओं में गरीब पशुपालक लाइन में, साहब के आवास में गाय!
मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार पशुपालन और कृषि पर निर्भर हैं। सरकारी योजनाओं के माध्यम से मिलने वाली सहायता और पशुधन उनके लिए महज योजना का आंकड़ा नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका का सहारा है।
जब जरूरतमंद पशुपालक सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए विभागों के चक्कर काटता है, दस्तावेज जुटाता है और महीनों इंतजार करता है, तब सरकारी विभाग के मुखिया के आवास में बिना टैग की गायें को लेकर सवाल उठना निश्चित तौर पर गंभीर है।
अगर गाय निजी है तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करने में क्या परेशानी है? और अगर सरकारी योजना से जुड़ी है तो उसका हिसाब-किताब सार्वजनिक क्यों नहीं होना चाहिए?
आदेश जारी करने में सख्ती, लेकिन पालन की निगरानी कौन करेगा?
उपसंचालक के पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चलित पशु चिकित्सा इकाइयों द्वारा प्रतिदिन कम से कम 5 केस अटेंड किए जाएं और 5 एआई कार्य किए जाएं। आदेश की अवहेलना पर वेतन रोकने और सेवा से पृथक करने जैसी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
वही यह सख्ती कागज पर अच्छी लगती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यही जवाबदेही विभाग के शीर्ष स्तर पर भी लागू होगी?
यदि छोटे कर्मचारी की गलती पर वेतन रोकने की बात हो सकती है, तो विभाग के मुखिया से जुड़े किसी भी सवाल की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
कानून और शासन के आदेश का डंडा नीचे तक ही क्यों? ऊपर तक उसकी पहुंच क्यों नहीं?
मंडला में वर्षों से जमे अधिकारी पर उठते रहे हैं सवाल
स्थानीय स्तर पर विभागीय कार्यप्रणाली और अधिकारी की भूमिका को लेकर समय-समय पर शिकायतें और सवाल उठने की बात सामने आती रही है। यदि किसी अधिकारी के लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने को लेकर शिकायतें होती हैं, तो संबंधित सक्षम अधिकारियों को इसकी निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए।
किसी अधिकारी के लंबे समय तक एक जिले में पदस्थ रहने मात्र से अनियमितता सिद्ध नहीं होती, लेकिन लगातार उठ रहे सवालों और शिकायतों की निष्पक्ष जांच न होना भी प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
आदिवासी जिले की जनता पूछ रही है—योजनाएं कागज पर या जमीन पर?
मंडला की जनता आज भी पशुपालन, कृषि, रोजगार, आवास, सिंचाई और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटती है। प्रदेश स्तर से आदेश जारी होते हैं, अभियान चलाए जाते हैं, समीक्षा बैठकें होती हैं और उपलब्धियों के आंकड़े तैयार होते हैं, लेकिन जमीन पर जरूरतमंद को उसका हक समय पर मिल रहा है या नहीं—यह सबसे बड़ा सवाल है।
पशुपालन विभाग के इस मामले में भी अब महज सफाई नहीं, बल्कि रिकॉर्ड आधारित स्पष्टता जरूरी है।
रेवांचल टाइम्स के सवाल
- उपसंचालक के शासकीय आवास में दिखाई दे रही बिना टैग की गायें किसकी है?
- क्या इन गायों में होना वाला कृत्रिम गर्भाधान विभाग के app पशु धन में एंट्री हैं
3.क्या इन गायों में समय समय पर गंभीर बीमारियां का टीकाकरणहो रहा है तो फिर किस पशु मालिक के नाम से एंट्री हो रहींहै
4.इन गायों से पैदा होने वाले बछड़े और बछिया की एंट्री किस नाम से हो रही है
5.अब जानना यह है बेचा जाना वाला दूध का पैसा क्या उपसंचालक महोदय की शासकीय नौकरी के अतिरिक्त आय की अन्य व्यबस्था है जो कि जांच का विषय है - क्या पशु का विभागीय पंजीयन या टैग नंबर उपलब्ध है?
- क्या विभागीय योजना से इसका कोई संबंध है?
- यदि गायें निजी है तो शासकीय आवास में रखने की अनुमति और व्यवस्था क्या है?
- क्या जिले में पशुधन वितरण योजनाओं के लाभार्थियों का भौतिक सत्यापन हुआ है?
- क्या MVU के प्रतिदिन 5 केस और 5 एआई वाले आदेश की वास्तविकता की भी स्वतंत्र समीक्षा होगी?
- क्या वरिष्ठ अधिकारी के स्तर पर भी वही जवाबदेही तय होगी, जो अधीनस्थ कर्मचारियों के लिए आदेश में निर्धारित की गई है?
अब गेंद विभाग और प्रशासन के पाले में है। सवाल गंभीर हैं और दस्तावेज सामने है। जरूरत इस बात की है कि जांच कागजों में नहीं, जमीन पर हो और यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो विभाग सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करे।
क्योंकि मंडला की जनता अब सिर्फ सरकारी आदेश सुनना नहीं चाहती—वह यह भी देखना चाहती है कि उन आदेशों पर अमल आखिर किस पर होता है और किस पर नहीं।
