दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मण्डला । सभी समुदायों के लिए हरियाली का पर्व खास है, पर जिले के आदिवासी जनजाति क्षेत्रों के लिए सावन की अमावस्या प्रकृति से रिश्ता जोड़ने का सबसे बड़ा दिन है। साल भर के सभी तीज-त्यौहारों की शुरुआत इसी दिन से होती है, इसलिए इसे पर्वों का राजा मानकर खुशनुमा अंदाज में मनाया जाता है।
ग्राम खम्हरिया निवासी और देशी संस्कृति के वाहक समाजसेवी पी.डी.खैरवार ने बताया कि नर्मदा कछार और दलदली पहाड़ के बीच बसे मोहगांव विकासखंड के खम्हरिया, उमरिया, डोंगरगांव, सुड़गांव, सिंगारपुर, सिमैया, गोरखपुर, औढ़ारी, बड़झर,खीसी ,चुभावल,पड़ादर,उमरडीह सहित सम्पूर्ण क्षेत्र में पीढ़ी दर पीढ़ी की मान्यताओं के चलते हरियाली के दिन सभी काम-धाम सामूहिक रूप से बंद रखकर त्यौहार को खूब धूमधाम से मनाया गया।
मान्यता है, कि इस दिन धरती माँ आराम करती हैं। इसलिए हल चलाना, निंदाई-गुड़ाई जैसे खेती-किसानी के कार्य बंद रखे जाते हैं। अच्छी बारिश और फसल की कामना के लिए महिलाएं आंगन में गोबर से चौक बनाकर धरती, नदी, पहाड़ और पेड़-पौधों की पूजा करती हैं।
परंपरागत रूप से ग्राम खम्हरिया के ग्वाल मानसिंह यादव जंगल से भिलावा और बाबालटी की पत्तियां लाकर हर घर के दरवाजे पर लगाते हैं। वहीं लोहार विश्वकर्मा रामनाथ घरों की चौखटों पर कीलें ठोकते हैं। बदले में दोनों को चावल, दाल, नमक, तेल और नगदी देकर मान-सम्मान किया जाता है। यह दृश्य गांवों की अटूट संस्कृति को दर्शाता है।
हरियाली पर्व पर भोग लगाए बिना चेंच भाजी खाना अपशकुन माना जाता है। महिलाएं बाड़ी से चेंच भाजी लाकर पहले देवी-देवताओं को भोग लगाती हैं, फिर उसे प्रसाद स्वरूप परिवार सहित गृहण करती हैं।
इस दिन गौशालाओं में मुर्रम मिट्टी पाटकर आवश्यक रूप से सफाई करने का भी प्रचलन है। गौशाला के देवता को गेहूं आटा का रोट को गुड़, घी का मिश्रण कर बनाए गए मलीदे का भोग लगाकर गौवंश वृद्धि की अर्जी लगाई जाती है। इस दिन गौवंश का आशीर्वाद प्राप्त करने चीला, बरा,पुड़ी जैसे स्थानीय पकवान बनाकर नमक और महुआ के साथ मोहलाइन पेड़ के पत्तों में गौवंश को परोसा जाता है।
शाम को गांव के चौक में मांदर, टिमकी, बांसुरी की धुन पर करमा, सैला और रीना का सामूहिक नृत्य करने की भी परंपरा आज भी जीवित है।
बुजुर्गों के अनुसार किसी भी अमावस्या के दिन पेड़ काटना सौ गौओं की हत्या के बराबर पाप है पर इस दिन पेड़ काटना और भी पापजनक माना जाता है। वहीं एक पौधा लगाना हजारों गौओं को पालने के बराबर फलदाई माना जाता है ।
नर्मदा और सतपुड़ा जंगल की गोद में बसे मण्डला के लिए जल-जंगल और जमीन ही जीवन है। “हर घर एक पौधा लगाने, जंगल बचेंगे तभी पीढ़ियां स्वस्थ रहेंगी” जैसे संदेश देकर पी .डी.खैरवार ने ग्रामीणों को प्रेरित किया।
