फर्जी अंकसूची से स्टाफ नर्स की नौकरी का आरोप, हाईकोर्ट पहुंचा मामला

Revanchal
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259 अंक वाली अंकसूची के बाद 355 अंक की अंकसूची सामने आने का दावा पात्र व्यक्ति भटक रहे अपात्र छान रहे मलाई

दो साल से हुई शिकायत के बावजूद भी नही की गई कार्रवाई, विभाग दे रहा हैं खुला संरक्षण बचा रहा है कार्यवाही से विभाग पर कार्यवाही न करने पर उठे सवाल

दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला, आदिवासी बाहुल्य जिले में शिक़वा शिकायतें सब जिम्मेदार ताक में रख कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते नजर आते है कार्यवाही के लिए आवेदकों को माननीय न्यायालय की शरण मे जाना पड़ता है क्योंकि इस जिले में सब कार्यवाही के नाम पर शून्य नजर आ रहै है। जहाँ फर्जीवाड़े फर्जी बिल फर्जी अंक सूचियों और फर्जी जाति में सरकारी लाभ लेने जैसे मामंले आये दिन संबधित विभाग तक शिकवा शिकायतें होती है पर उनमें जांच को आजम तक कभी भी विभाग अंतिम निष्कर्ष पहुँचे देखा गया हैं ।


वही जानकारी के अनुसार मंडला जिले में मुख्य चिकित्सा एव स्वास्थ्य अधिकारी मंडला के अधीनस्थ जिला चिकित्सालय मंडला में एक मामला प्रकाश में आया है जहाँ एक स्टॉप नर्स फर्जी अंक सूची का उपयोग कर शासकीय सेवा का लाभ ले रही है और जिसकी शिकायत एक जिम्मेदार युवक व पत्रकार ने इसकी शिकायत मय शक्ष्यो के विभाग सहित समस्त जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी व जनप्रतिनिधियों को लिखित की गई पर दो वर्ष बीतने के बाद भी उस आवेदन में कोई कार्यवाही नही की गई और आज भी कार्यवाही न होने की दशा में आवेदक को माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर का दरवाजा खटखटना पड़ा,
मंडला जिला चिकित्सालय में शासकीय सेवा में स्टाफ नर्स के पद पर नियुक्ति को लेकर कथित तौर पर अलग-अलग अंकसूचियां प्रस्तुत किए जाने का मामला अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर की चौखट तक पहुंच गया है। रेवांचल टाइम्स के संपादक मुकेश श्रीवास द्वारा कुमारी उर्मिला मर्सकोले के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका में आरोप लगाया गया है कि बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई के दौरान कक्षा 12वीं की अंकसूची के संबंध में विरोधाभासी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। मामले की सुनवाई कल निर्धारित बताई गई है।

एक ही परीक्षा, दो अंकसूचियां और अंकों में बड़ा अंतर

याचिकाकर्ता के अनुसार, कथित तौर पर एक अंकसूची में पांच विषयों के कुल 450 अंकों में 259 अंक तथा द्वितीय श्रेणी दर्ज है, जबकि विभाग में प्रस्तुत दूसरी अंकसूची में 355 अंक और प्रथम श्रेणी दर्शाई गई है। दोनों दस्तावेजों में समान परीक्षा और विषयों से संबंधित विवरण होने के बावजूद प्राप्तांकों एवं श्रेणी में अंतर होने का आरोप लगाया गया है।

यदि दोनों दस्तावेज वास्तव में एक ही परीक्षा से संबंधित हैं, तो अंकों में इतना बड़ा अंतर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, इन दस्तावेजों की वास्तविकता और वैधता का अंतिम निर्धारण संबंधित शैक्षणिक संस्था के मूल अभिलेखों के सत्यापन तथा सक्षम जांच एजेंसी की जांच के बाद ही हो सकेगा।

शिकायतें होती रहीं, कार्रवाई का इंतजार खत्म नहीं हुआ

याचिकाकर्ता का कहना है कि मामले को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी मंडला, पुलिस अधीक्षक मंडला, क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं जबलपुर, पुलिस महानिरीक्षक बालाघाट, कलेक्टर मंडला सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को अभ्यावेदन दिए गए। शिकायतकर्ता के मुताबिक, इसके बावजूद कथित अंकसूचियों की मूल रिकॉर्ड से जांच कराने की दिशा में अब तक कोई भी प्रभावी कार्रवाई सम्बंधित अधिकारियों के द्वारा न ही सामने आई और न ही आज तक इस गंभीर विषय को लेकर कोई कार्यवाही की गई।

यही स्थिति अब शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। यदि किसी शासकीय कर्मचारी की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों में प्रथम दृष्टया गंभीर विसंगति की शिकायत सामने आती है, तो क्या संबंधित विभाग की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड मंगाकर सत्यता की जांच कराए?

नौकरी सरकारी, दस्तावेजों की जांच की जिम्मेदारी किसकी?

शासकीय सेवा में नियुक्ति योग्यता और प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर होती है। ऐसे में नियुक्ति से जुड़े दस्तावेजों पर सवाल उठने के बाद लंबे समय तक जांच लंबित रहना व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। खासकर तब, जब शिकायतकर्ता अलग-अलग अंकसूचियों के आधार पर दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल उठा रहा हो। मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि कथित अंकसूचियों की जांच केवल उनकी प्रतियों के आधार पर नहीं, बल्कि संबंधित बोर्ड अथवा शैक्षणिक संस्था के मूल रिकॉर्ड से कराई जाए। यदि दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो शिकायत पर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और यदि उनमें कूटरचना या फर्जीवाड़ा प्रमाणित होता है तो नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।

अब हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजर

मामले में अब सबकी नजर हाईकोर्ट की सुनवाई पर है। याचिका में कथित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराने इसके साथ ही यदि दस्तावेज फर्जी या कूटरचित पाए जाएं तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है।
फिलहाल यह आरोप हैं और इनकी सत्यता न्यायिक प्रक्रिया तथा सक्षम जांच में तय होगी। ऐसे में सबसे अहम सवाल यही है कि संबंधित विभाग और जांच एजेंसियां कथित दोनों अंकसूचियों का मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड से सत्यापन कराने को लेकर अदालत के समक्ष क्या जवाब प्रस्तुत करती हैं।
सवाल यह भी है कि जिस मामले की शिकायतें संबंधित अधिकारियों तक पहुंच चुकी थीं, उसमें हाईकोर्ट की शरण लेने की नौबत क्यों आई? क्या शासन-प्रशासन स्वयं दस्तावेजों की सत्यता की जांच कर इस पूरे मामले की स्थिति पहले ही स्पष्ट नहीं कर सकता था तो वहीं एक और गंभीर सवाल यह भी पैदा करता हैं कि जब स्टाफ नर्स उर्मिला मर्सकोले की शिकायत जिला स्वास्थ्य अधिकारी मंडला और अन्य विभाग को पहले ही की गई थी तो स्टाफ नर्स उर्मिला मर्सकोले को किसका संरक्षण प्राप्त हैं जिसकी सह पर जांच आज भी लंबित पड़ी हुई हैं। और एक उचित वा कड़ी कार्यवाही न करते हुए गलत तरीके से शासन और आमजनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा हैं।

इनका कहना हैं…

मेरे द्वारा करीब दो वर्ष पूर्व में उर्मिला मर्सकोले द्वारा कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर गलत तरीके से नौकरी पर पदस्थ होने की शिकायत जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, जिला स्वास्थ्य अधिकारी मंडला वा अन्य कार्यालयों में शिकायत की गई थी, परंतु आज दिनांक तक जब कहीं से कोई जांच और ठोस कार्यवाही नहीं की गई तो मजबूरुरन माननीय न्यायालय की शरण पर जाना पड़ा।
मुकेश श्रीवास संपादक
दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला

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