
लेकिन वास्तव में क्या अपना भारत गणतंत्र है…? यह प्रश्न विचारणीय है ।
दैनिक रेवांचल टाईम्स – गणतंत्र दिवस भारत के लिए गर्व और आत्ममंथन का दिन है। यह दिन उस संविधान का अभिनंदन करता है जिसने देश के प्रत्येक नागरिक को समानता, न्याय और स्वतंत्रता का आश्वासन दिया, पर साथ ही यह प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या इन वादों को सत्ता में बैठी सरकारें ईमानदारी से निभा पाईं। आज़ादी के सात दशक से अधिक समय बाद भी यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा मुख्यधारा से बाहर खड़ा है, तो यह केवल ऐतिहासिक परिस्थितियों की नहीं, बल्कि नीतिगत विफलताओं की भी कहानी है।
भारत का संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करता है, किंतु व्यवहार में सरकारी नीतियाँ अक्सर आर्थिक विकास के आँकड़ों तक सीमित रह गईं। योजनाएँ बनीं, बजट आए, घोषणाएँ हुईं, पर ज़मीनी हकीकत यह रही कि विकास का लाभ समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुँच सका। ग्रामीण भारत, आदिवासी क्षेत्र, शहरी झुग्गियाँ और असंगठित श्रमिक वर्ग दशकों तक केवल “लाभार्थी” की परिभाषा में सिमटकर रह गए, नीति-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी नगण्य रही।
शिक्षा के क्षेत्र में तो सरकारों की असफलता और भी सबसे अधिक उजागर होती है। संविधान ने शिक्षा को समान अवसर का माध्यम माना, पर सरकारी स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और निजीकरण की नीतियों ने शिक्षा को वर्ग-विशेष का अधिकार बना दिया। परिणामस्वरूप, करोड़ों बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह गए और सामाजिक असमानता पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजबूत होती चली गई।
स्वास्थ्य, जो किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होता है, लंबे समय तक नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता सूची में पीछे रहा। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा, संसाधनों की कमी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता ने गरीब और मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा असुरक्षित बना दिया। विगत वर्षों में अचानक से आई महामारी जैसे संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास के दावे मजबूत थे, पर सामाजिक ढांचा बहुत ही ज्यादा कमजोर।
रोज़गार के मोर्चे पर भी सरकारें बड़े वादों और सीमित परिणामों के बीच फँसी रहीं। औद्योगीकरण और उदारीकरण की नीतियाँ लागू हुईं, पर वे व्यापक रोज़गार सृजन में असफल रहीं। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाला श्रमिक आज भी सामाजिक सुरक्षा, स्थिर आय और सम्मानजनक जीवन से वंचित है। नीति-निर्माण में श्रम की गरिमा से अधिक पूँजी की सुविधा को महत्व दिया गया।
सबसे विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि लोकतंत्र के इस गणराज्य में जनता की आवाज़ को कई बार असहमति के रूप में देखा गया। आलोचना को राष्ट्रविरोधी ठहराने की प्रवृत्ति ने लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर किया। जबकि गणतंत्र का सार यही है कि सत्ता से प्रश्न पूछे जाएँ और नीतियों का पुनर्मूल्यांकन हो।
इसके बावजूद, गणतंत्र दिवस पर राष्ट्राभिनंदन आवश्यक है, क्योंकि संविधान आज भी आशा का सबसे बड़ा दस्तावेज़ है। समस्या संविधान में नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन में रही है। यदि सरकारें सामाजिक न्याय को केवल भाषणों तक सीमित न रखें, यदि नीति-निर्माण में वंचित वर्ग को सहभागी बनाया जाए और यदि विकास को मानव गरिमा से जोड़ा जाए, तभी गणतंत्र अपने वास्तविक अर्थ में सफल होगा।
गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि समाज परिवर्तन का वादा थी। उस वादे को निभाने की जिम्मेदारी आज भी सरकारों और नागरिकों दोनों पर समान रूप से है। यही सच्चा राष्ट्राभिनंदन है—अंधी प्रशंसा नहीं, बल्कि साहसिक सत्य।
77 वें गणतंत्र_दिवस की विशेष स्मृति पर…
आप सभी देश भक्तों को गणतंत्र दिवस के पावन पुनीत पर्व की मंगल शुभकामनाएं..!!🇮🇳🇮🇳🇮🇳
जय हिंद..
जय भारत
जय संविधान..
जय सियाराम..
जय जवान..
जय किसान..
जय विज्ञान…
अवधेश (पवन)
