तहसील कार्यालय में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर का दबदबा आदिवासी महिला ने लगाए आरोप न्याय नहीं मिला तो आत्महत्या की चेतावनी

Revanchal
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घुघरी में एक ही व्यक्ति के दोहरे दायित्व पर भी उठे सवाल, ग्राम पंचायत में पंच और तहसील कार्यालय में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम करने का आरोप

रेवांचल टाइम्स घुघरी, मंडला तहसील कार्यालय घुघरी में कार्यरत एक प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ एक आदिवासी महिला द्वारा शिकायत किए जाने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में घुघरी ग्राम पंचायत की रहने वाली आदिवासी महिला प्रीति धुर्वे जनसुनवाई में आवेदन प्रस्तुत कर न्याय की गुहार लगाई। महिला ने आरोप लगाया कि तहसील कार्यालय घुघरी में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत मनोहर नंदा, जो स्थानीय वार्ड क्रमांक 8 से निर्वाचित पंच भी हैं, उसे और उसके परिवार को कथित रूप से परेशान किया जा रहा है तथा उनकी लंबे समय से काबिज भूमि और मकान पर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है।


शिकायत में महिला ने यहां तक चेतावनी दी है कि यदि उसे न्याय नहीं मिला तो वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर होगी और इसकी जिम्मेदारी शासन प्रशासन की होगी। इस चेतावनी के बाद मामला और भी गंभीर हो गया है तथा प्रशासन के सामने शिकायत की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती खड़ी हो गई है।

कई वर्षों से जमीन पर काबिज होने का दावा

प्रीति धुर्वे ने अपने आवेदन में बताया कि उसकी मां मुन्नीबाई लंबे समय से भूमि खसरा नंबर 129 पर काबिज हैं। इसी जमीन से संबंधित हिस्से में उनका कच्चा मकान बना हुआ है, जहां उनका परिवार वर्षों से निवास करता आ रहा है। महिला का आरोप है कि अब उनके मकान और जमीन को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है तथा उन्हें वहां से बेदखल करने का कथित प्रयास किया जा रहा है।
महिला के अनुसार, वह और उसका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है और इसी कच्चे मकान में रहकर अपना जीवन गुजार रहा है। ऐसे में यदि मकान को नुकसान पहुंचाया जाता है या परिवार को जमीन से बेदखल किया जाता है तो उनके सामने रहने का संकट पैदा हो जाएगा।

जेसीबी से मकान गिराने की धमकी का आरोप
शिकायत में प्रीति धुर्वे ने आरोप लगाया कि मनोहर नंदा द्वारा उन्हें कथित रूप से धमकाया जाता है। महिला के मुताबिक, उसे यह कहा जाता है कि वह जहां चाहे शिकायत कर ले, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि तहसील कार्यालय में अपनी पहुंच का हवाला देते हुए संबंधित व्यक्ति द्वारा कहा जाता है कि वह तहसीलदार से जैसा कहेगा, वैसा ही काम कराया जाएगा।
महिला ने अपने आवेदन में यह भी आरोप लगाया है कि उसके कच्चे मकान के पीछे स्थित हिस्से में मनोहर नंदा और उसके परिवार द्वारा दीवार के किनारे पेड़-पौधे लगाए गए तथा उसके मकान को कथित रूप से नुकसान पहुंचाया गया। महिला का आरोप है कि उसे जेसीबी से मकान गिरवा देने की धमकी भी दी गई है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में अब प्रशासनिक जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तविक स्थिति क्या है और शिकायत में लगाए गए आरोप कितने सही हैं।
स्वामित्व योजना में पट्टा रुकवाने का भी आरोप
शिकायत का सबसे गंभीर पहलू आबादी भूमि पर अधिकार से जुड़ा है। प्रीति धुर्वे का कहना है कि जिस जमीन पर उनका कच्चा मकान स्थित है, उसी जमीन से संबंधित भू-आवासीय अधिकार पत्र मनोहर नंदा के नाम से बनाए जाने की जानकारी उन्हें मिली है।
महिला ने आरोप लगाया कि शासन द्वारा आबादी भूमि में लंबे समय से काबिज लोगों को स्वामित्व योजना के तहत अधिकार और पट्टा उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही थी। उनका भी पट्टा बनने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी, लेकिन तहसील कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत होने के कारण मनोहर नंदा ने कथित रूप से इसमें बाधा उत्पन्न की और उनका पट्टा नहीं बनने दिया।
यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल निजी भूमि विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी योजना की प्रक्रिया और हितों के टकराव से जुड़े सवाल भी खड़े होंगे। यही वजह है कि महिला ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

एक व्यक्ति, दो जिम्मेदारियां—व्यवस्था पर सवाल
शिकायत में एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है। महिला के अनुसार मनोहर नंदा स्थानीय वार्ड क्रमांक 8 से निर्वाचित पंच हैं और इसके साथ ही तहसील कार्यालय घुघरी में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्य कर रहे हैं।
एक ओर वे ग्राम पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधि की भूमिका में हैं, वहीं दूसरी ओर तहसील कार्यालय में राजस्व संबंधी कार्यों से जुड़े कार्यालयीन कामकाज में उनकी भूमिका होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में यदि किसी स्थानीय नागरिक का जमीन या पट्टे से संबंधित विवाद उन्हीं से जुड़े कार्यालयीन कार्यों के दायरे में आता है तो निष्पक्षता और हितों के टकराव को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब प्रशासन के सामने यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि उक्त व्यक्ति की तहसील कार्यालय में नियुक्ति किस आधार पर है, उनके अधिकार और कार्यक्षेत्र क्या हैं तथा क्या पंचायत के निर्वाचित पंच के रूप में रहते हुए इस प्रकार की भूमिका निभाना नियमानुसार है।
कई आवेदन देने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का दावा
प्रीति धुर्वे का कहना है कि उन्होंने इस मामले को लेकर पूर्व में भी कई बार आवेदन दिए, लेकिन शिकायतों पर अपेक्षित जांच और कार्रवाई नहीं हुई। महिला का आरोप है कि के बार आवेदन देने के बावजूद उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है।
आखिरकार मंगलवार की जनसुनवाई में महिला ने कलेक्टर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उसने मांग की है कि मनोहर नंदा को घुघरी तहसील कार्यालय से हटाया जाए, उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच की जाए और उसके परिवार को उसकी काबिज भूमि एवं मकान से बेदखल करने के कथित प्रयास पर रोक लगाई जाए।
आत्महत्या की चेतावनी ने बढ़ाई प्रशासन की जिम्मेदारी
शिकायत का सबसे चिंताजनक पहलू महिला द्वारा न्याय नहीं मिलने की स्थिति में आत्महत्या करने की चेतावनी है। किसी भी जनसुनवाई में यदि कोई पीड़ित नागरिक इस स्तर तक निराश होकर जीवन समाप्त करने की बात कहता है तो यह केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी मानी जानी चाहिए।
प्रशासन को चाहिए कि मामले को महज जमीन संबंधी विवाद मानकर फाइलों में सीमित न रखे, बल्कि महिला की शिकायत, भूमि के दस्तावेज, खसरा नंबर 129 की वास्तविक स्थिति, आबादी भूमि के रिकॉर्ड, स्वामित्व योजना के अंतर्गत तैयार दस्तावेज तथा कथित भू-आवासीय अधिकार पत्र की निष्पक्ष जांच कराए।
साथ ही यह भी जांच का विषय है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में तहसील कार्यालय में किस पद और किस व्यवस्था के तहत कार्य कर रहा है तथा उसके पास राजस्व रिकॉर्ड या पट्टा संबंधी प्रक्रिया में कितना अधिकार है।
अब देखना है प्रशासन क्या करता है
आदिवासी हितों और कमजोर वर्गों के अधिकारों को लेकर सरकार लगातार योजनाएं चला रही है। ऐसे में यदि किसी आदिवासी परिवार द्वारा सरकारी कार्यालय में कार्यरत व्यक्ति पर दबाव, धमकी और जमीन संबंधी अधिकार प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए जाते हैं तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
मामले में शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन आरोपों की गंभीरता और महिला द्वारा की गई आत्महत्या की चेतावनी को देखते हुए निष्पक्ष जांच जरूरी है। साथ ही शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष, दोनों का पक्ष सुनकर दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि जनसुनवाई में दिए गए इस आवेदन पर कितनी तेजी से जांच होती है और क्या घुघरी तहसील कार्यालय में प्राइवेट कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका, उसके पंचायत से जुड़े पद और शिकायत में उठाए गए भूमि विवाद की निष्पक्ष जांच कराई जाती है। फिलहाल एक आदिवासी महिला की यह शिकायत घुघरी की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने बडा सवाल बनकर खड़ी हो गयी है।

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