दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला/मंडला जिले में आज एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने पत्थर दिल को भी पिघला दिया। नाली में गिरकर एक कुत्ते के बच्चे की मौत हो गई। यह खबर जितनी छोटी थी, उससे जुड़ा दर्द उतना ही बड़ा। उस कुत्ते के बच्चे के लिए एक छोटी बच्ची का रो-रोकर बुरा हाल था। शायद कुछ ही महीनों में उसने उसे खिलाया-पिलाया होगा, उसके साथ खेला होगा, उसे अपना साथी बना लिया होगा। आज वही बच्ची नाली के किनारे बैठकर फफक फफक कर ऐसे रो रही थी, जैसे उसने किसी अपने को खो दिया हो।
उधर देश के सबसे आधुनिक और रिहायशी इलाकों में गिने जाने वाले ग्रेटर नोएडा में एक नौजवान लड़के की सड़क किनारे बने गड्ढे में कार सहित गिर जाने से मौत हो जाती है। मौत भी अचानक से नहीं होती, उस युवक ने करीब तीन से चार घंटे तक अपनी जान बचाने के लिए मशक्कत की रोया, चिल्लाया कि कोई तो मुझे बचा लो पर परिणाम अंत में दुखद ही आते है। एक नौजवान युवक की मौत…..कारण चाहे सिस्टम की लापरवाही हो या गलती, लेकिन नतीजा वही—एक ज़िंदगी खत्म। और उसके बाद जो दिखता है, वह और भी भयावह है। पूरा सिस्टम हाथ में हाथ धरे बैठा रहता है। कोई महानगर पालिका को दोष देता है, कोई पुलिस को, कोई बिल्डर को, तो कोई प्रशासन को। हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है, लेकिन मरने वाले के माँ-बाप की चीखें किसी फाइल में दर्ज नहीं होतीं।
आज सवाल यह नहीं है कि गलती किसकी थी। सवाल यह है कि
क्या एक छोटे शहर की छोटी बच्ची की इंसानियत और महानगर में रहने वाले इंसानों की मानवता में फर्क हो गया है?
एक ओर वह बच्ची, जिसे शायद यह भी नहीं पता कि कानून क्या होता है, सिस्टम क्या होता है, लेकिन उसे यह जरूर पता है कि किसी की जान जाना दर्द देता है। दूसरी ओर वह महानगर, जहाँ सब कुछ है—ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमचमाती लाइटें—लेकिन संवेदनाएँ कहीं गुम हो गई हैं।
हम आज अंधाधुंध विकास की दौड़ में शामिल हैं। बड़े घर, बड़ी गाड़ियाँ, बड़े सपने—सब कुछ चाहिए। लेकिन इस दौड़ में सबसे पहले जो कुचला जा रहा है, वह है इंसानियत।
आज हादसा होता है, लोग वीडियो बनाते हैं।
आज मौत होती है, लोग खबर पढ़ते हैं।
आज दर्द होता है, लोग अगले स्क्रोल में आगे बढ़ जाते हैं।
मंडला की इस नन्हीं बच्ची ने हमें बिना भाषण दिए एक बड़ा सबक सिखा दिया। उसने यह दिखा दिया कि इंसान होना क्या होता है। उसके लिए वह कुत्ते का बच्चा सिर्फ जानवर नहीं था, वह उसका दोस्त था। उसके आँसू यह सवाल पूछ रहे थे—
क्या हम इतने बड़े हो गए हैं कि हमें अब किसी की मौत का दर्द महसूस ही नहीं होता?
शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।
हम शहर तो बना रहे हैं, लेकिन दिल छोटे होते जा रहे हैं।
हम तकनीक में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन संवेदना में पीछे जा रहे हैं।
आज ज़रूरत यह नहीं है कि हम और ऊँची इमारतें बनाएं, बल्कि यह है कि हम अपने भीतर गिरी हुई इंसानियत को उठाएँ।
क्योंकि अगर एक नन्हीं छोटी बच्ची किसी बेजुबान की मौत पर रो सकती है, तो हम इतने बड़े होकर भी किसी इंसान की मौत पर चुप क्यों हैं?
आज मंडला की उस बच्ची ने और ग्रेटर नोएडा के उस हादसे ने हमें आईना दिखा दिया है।
अब फैसला हमें करना है—
आज हमें विकास के रास्ते के साथ ही साथ मानवता और इंसानियत को दिलों जज़्बात में जिंदा रखते हुए आगे बढ़ना होगा।
शीर्षक : इंसानियत-एक बच्ची के आँसू और महानगर की बेबसी—हमारी मरती हुई इंसानियत की कहानी
