योजना का लाभ किसे? किसान परेशान, विभाग पर मिलीभगत के आरोप
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।
जिले में कृषि विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। किसानों को राहत देने वाली योजनाएं कागजों तक सिमटती नजर आ रही हैं, जबकि जमीनी हकीकत में नकली खाद और बीज का कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन सबके बीच जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे बैठे हैं।
सूत्रों के अनुसार, मंडला जिले में कई दुकानें बिना वैध अनुमति के खाद-बीज का अवैध व्यापार कर रही हैं। आरोप है कि इन पर कार्रवाई करने के बजाय विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से इन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। जनपद पंचायत नैनपुर के ग्राम पिंडरई में हाल ही में एक दुकान पर की गई कार्रवाई भी “सिर्फ दिखावा” बनकर रह गई — कुछ दिन हलचल, फिर मामला ठंडे बस्ते में।
इसी तरह जिला मुख्यालय के ग्राम पेटेगांव स्थित एक प्रतिष्ठान पर जनसुनवाई के बाद छापेमारी की खबर तो आई, लेकिन आज तक न तो ठोस कार्रवाई हुई, न ही कोई स्पष्ट जवाब सामने आया। इससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या विभाग की कार्रवाई सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट तक सीमित है?
किसान पूछ रहे — “जब बाजार से ही खरीदना है, तो विभाग किस काम का?”
जिले के किसान अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब उन्हें महंगे दामों पर बाजार से खाद और बीज खरीदना पड़ रहा है, तो कृषि विभाग की योजनाएं आखिर किसके लिए हैं? सरकारी वितरण व्यवस्था कमजोर क्यों है? और पात्र किसानों तक लाभ क्यों नहीं पहुंच रहा?
मिलीभगत या लापरवाही? जवाब दे विभाग
कृषि विभाग की चुप्पी अब संदेह को और गहरा कर रही है। मीडिया में लगातार भ्रष्टाचार, गबन और घोटालों की चर्चाएं हो रही हैं, लेकिन न जांच में तेजी दिख रही है, न दोषियों पर कार्रवाई। इससे यह आशंका और मजबूत होती जा रही है कि कहीं विभाग खुद ही इस पूरे खेल में शामिल तो नहीं?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी सवालों में
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर खामोश क्यों हैं? किसानों की परेशानी क्या उन्हें दिखाई नहीं दे रही? अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
जनता की मांग — दिखावा नहीं, सख्त कार्रवाई चाहिए
किसानों और आम जनता की साफ मांग है कि जिले में चल रहे नकली खाद-बीज के कारोबार की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और कृषि विभाग की योजनाओं का वास्तविक लाभ खेत-खलिहान तक पहुंचे।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार जागते हैं या फिर एक और मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।
