करोड़ों की लागत से बन रहा आदिवासी कन्या आश्रम भवन, गुणवत्ता पर उठे सवाल

Revanchal
7 Min Read

नारायणगंज में निर्माण कार्य पर लापरवाही के आरोप, बिना क्यूब टेस्टिंग के जारी है काम

रेवांचल टाइम्स नारायणगंज मंडला जिले में आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर छात्रावास एवं आश्रम भवनों का निर्माण करा रही है। इन भवनों का मकसद दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले छात्र-छात्राओं को सुरक्षित वातावरण, आधुनिक सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों की कथित मिलीभगत के चलते निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ताजा मामला नारायणगंज स्थित आदिवासी कन्या अंग्रेजी आश्रम भवन निर्माण से जुड़ा हुआ है, जहां करोड़ों की लागत से बन रहे भवन में अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।


सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नारायणगंज में आदिवासी कन्या अंग्रेजी आश्रम भवन का निर्माण कार्य लगभग 1 करोड़ 97 लाख 87 हजार रुपये की स्वीकृत लागत से कराया जा रहा है। निर्माण एजेंसी के रूप में ठेकेदार सदानंद पटैल कार्य करवा रहे हैं। इस भवन की निर्माण अवधि 18 माह निर्धारित की गई है तथा कार्य नवंबर 2025 से प्रारंभ बताया जा रहा है।

लेकिन निर्माण स्थल पर पहुंचने पर कई कमियां दिखाई दीं, जो सीधे तौर पर निर्माण गुणवत्ता और विभागीय निगरानी पर सवाल खड़े करती हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि निर्माण स्थल पर अब तक सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। शासन के नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी निर्माण कार्य स्थल पर परियोजना की लागत, एजेंसी, कार्य अवधि, तकनीकी स्वीकृति एवं संबंधित अधिकारियों की जानकारी वाला बोर्ड अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिक भी कार्य की निगरानी कर सकें।

लेकिन यहां ऐसा कोई बोर्ड नहीं मिला। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर निर्माण एजेंसी क्या छिपाना चाहती है और विभागीय अधिकारी इस पर मौन क्यों हैं। इसके अलावा निर्माण स्थल पर क्यूब टेस्टिंग लैब भी उपलब्ध नहीं है। निर्माण कार्य में उपयोग किए जा रहे कंक्रीट की मजबूती जांचने के लिए समय-समय पर क्यूब टेस्टिंग कराना अनिवार्य होता है। निर्माण स्थल पर मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि अब तक लगभग 20 क्यूब बनाए जा चुके हैं, जिनमें प्लिंथ, कॉलम और फुटिंग बीम के अलग-अलग नमूने शामिल हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन क्यूबों की अब तक लैब में टेस्टिंग ही नहीं कराई गई है।


तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार कंक्रीट क्यूब की गुणवत्ता जांच 28 दिनों के भीतर कराई जाना जरूरी होता है। इससे यह पता चलता है कि भवन निर्माण में उपयोग किया गया मसाला निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं। लेकिन यहां पांच माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद टेस्टिंग नहीं कराई गई।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना गुणवत्ता परीक्षण के आखिर भवन की मजबूती का आकलन कैसे किया जा रहा है यदि निर्माण सामग्री कमजोर निकली तो इसका सीधा खतरा उन छात्राओं की जान पर पड़ेगा, जो भविष्य में इस भवन में रहेंगी।स्थानीय लोगों का आरोप है कि ठेकेदार अधिक मुनाफा कमाने के लिए निर्माण सामग्री में भारी कटौती कर रहे हैं।

सीमेंट, रेत और गिट्टी के अनुपात में गड़बड़ी कर घटिया गुणवत्ता का निर्माण कराया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि विभागीय उपयंत्री और एसडीओ की कथित मिलीभगत से यह सब संभव हो रहा है। नियमित निगरानी और तकनीकी परीक्षण के अभाव में ठेकेदार मनमर्जी से कार्य करा रहे हैं।


इस पूरे मामले ने पिछले वर्ष हुए एक अन्य निर्माण कार्य की भी याद ताजा कर दी है। नारायणगंज में ही रानी वीरांगना दुर्गावती कन्या छात्रावास के 50 सीटर दो मंजिला भवन का निर्माण कराया गया था। करोड़ों की लागत से बने उस भवन की पहली ही बारिश में दोनों मंजिलों की छत टपकने लगी थी। निर्माण कार्य की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि भवन की मजबूती पर सवाल खड़े हो गए थे। अब वही आशंका आदिवासी कन्या अंग्रेजी आश्रम भवन को लेकर भी जताई जा रही है। यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यह भवन भी भविष्य में खतरे का कारण बन सकता है।

गौरतलब है कि आदिवासी अंचलों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए सरकार लगातार बजट बढ़ा रही है। छात्रावासों और आश्रमों के माध्यम से गरीब और दूरस्थ क्षेत्रों की छात्राओं को बेहतर सुविधाएं देने की योजना बनाई गई है। लेकिन यदि निर्माण कार्यों में ही भ्रष्टाचार और लापरवाही हावी रही तो सरकार की मंशा पर पानी फिरता नजर आएगा। भवन निर्माण में गुणवत्ता से समझौता केवल सरकारी धन की बर्बादी नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।


स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि निर्माण कार्य की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराई जाए। अब तक बनाए गए क्यूबों की तत्काल लैब टेस्टिंग कराई जाए तथा निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो। साथ ही जिन अधिकारियों की निगरानी में यह कार्य हो रहा है, उनकी भूमिका की भी जांच की जाए। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।


अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या करोड़ों की लागत से बन रहे इस भवन की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाएगी या फिर सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती रहेंगी। फिलहाल नारायणगंज का यह निर्माण कार्य कई सवाल खड़े कर रहा है, जिनका जवाब जिम्मेदार अधिकारियों को देना होगा।

Share This Article
Translate »