आखिर कब तक चलेगी जांच? किसानों के साथ हुए कथित करोड़ों के बीज घोटाले पर कार्रवाई कब? सवालों के घेरे में शासन की मंशा

Revanchal
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डिंडोरी से मंडला तक… जांच ठंडे बस्ते में, जिम्मेदार अफसर कुर्सी पर कायम! आखिर किसका संरक्षण?

दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला/डिंडोरी
आदिवासी किसानों के नाम पर संचालित योजनाओं में कथित अनियमितताओं और बीज वितरण घोटाले को लेकर उठे गंभीर सवालों का जवाब आज तक नहीं मिल पाया है।
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार डिंडोरी जिले में वर्ष 2021-22 के कथित बीज वितरण घोटाले की जांच वर्षों बाद भी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है। विभागीय जांच, दस्तावेजी विसंगतियां और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) तक मामला पहुंचने के बावजूद न तो दोष तय हुए और न ही अब तक कोई बड़ी कार्रवाई सामने आई।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जांच कब पूरी होगी? यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित अधिकारी को क्लीन चिट क्यों नहीं दी जा रही? और यदि आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर पाए गए हैं, तो फिर कार्रवाई में इतनी देरी क्यों?

किसानों के साथ अन्याय, लेकिन फाइलों में कैद जांच

आदिवासी जिले के किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई योजना आज खुद सवालों के घेरे में है। विभागीय जांच में कई गंभीर विसंगतियां सामने आने के बाद भी मामला वर्षों से फाइलों में घूमता दिखाई दे रहा है। किसान पूछ रहे हैं कि जिन योजनाओं का उद्देश्य उनकी आय बढ़ाना था, उन्हीं योजनाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच आखिर ठंडे बस्ते में क्यों डाल दी गई?

जांच जारी… लेकिन जिम्मेदारी भी जारी!

सबसे अधिक हैरानी इस बात को लेकर जताई जा रही है कि जिन अधिकारी अश्वनी कुमार झारिया के संबंध में विभागीय जांच में गंभीर आरोपों की जांच हुई और मामला EOW तक पहुंचा, वे आज भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। यदि जांच लंबित है, तो शासन की नीति क्या है? क्या ऐसे मामलों में जांच पूरी होने तक प्रशासनिक स्तर पर एहतियाती कदम नहीं उठाए जाने चाहिए? यही सवाल अब किसान और सामाजिक संगठन उठा रहे हैं।

क्या प्रभावशाली अधिकारियों को मिल रहा संरक्षण?

लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर ऐसे मामलों में कार्रवाई इतनी धीमी क्यों हो जाती है। क्या जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई है? क्या प्रभावशाली अधिकारियों को प्रशासनिक संरक्षण मिल रहा है? इन सवालों के जवाब देना अब शासन और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है।

मंडला में भी उठने लगे सवाल

डिंडोरी के बाद अब मंडला जिले में भी विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। किसानों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध गंभीर जांच लंबित है, तो उसकी निष्पक्षता और विभाग की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे में वर्तमान कार्यकाल की कार्यप्रणाली की भी पारदर्शी समीक्षा किए जाने की मांग तेज हो रही है।
किसानों का सीधा सवाल
जांच पूरी होने में आखिर कितने साल और लगेंगे? यदि जांच में तथ्य मिले हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि कोई दोष नहीं है तो जनता के सामने रिपोर्ट क्यों नहीं रखी जाती?
क्या किसानों के हितों से जुड़े मामलों में भी जवाबदेही तय नहीं होगी?

अब शासन को जवाब देना होगा

आदिवासी किसानों के नाम पर संचालित योजनाओं में कथित अनियमितताओं के आरोप कोई सामान्य विषय नहीं हैं। यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो दोषियों पर कार्रवाई होना आवश्यक है, और यदि आरोप गलत हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट रूप से राहत दी जानी चाहिए। लेकिन वर्षों तक जांच लंबित रहने से न केवल किसानों का विश्वास कमजोर होता है, बल्कि पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
वही नगर और किसानों के बीच जमके जनचर्चा चल रही है कि इन दिनों दिन व दिन बढ़ रहे भ्रष्टाचार ग़बन घोटाले करने वालो जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी सरकारी योजनाओं और गरीबों की योजनाओं लूट कर अपना घर और अपने चाहेते को फायदा पहुँचाया जा रहा है और जब पकड़े गए या शिकवा शिकायत हुई तो लूट के कमाए हुए पैसों से भ्रस्टो पर लगे आरोप प्रत्यारोप को साफ करने ऊपर से लेकर नीचे चढ़वा चढ़ाने पर सब कुछ सेट और जांच चलती रहती और कार्यालय में रखे धूल खाती नजर आती है।
अब इंतजार सिर्फ एक बात का है—क्या सरकार और जांच एजेंसियां इस मामले में निर्णायक कदम उठाएंगी, या फिर किसानों के नाम पर उठे ये गंभीर सवाल भी सरकारी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएंगे?

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