दैनिक रेवाँचल टाईम्स – चार दिन के प्रवास पर संगठन विस्तार के लिए दार्जलिंग पहुँचे स्वामी स्वदेशानंद अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय सन्त बौद्धिक मंच के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सनातनी अखाड़ा के संस्थापक संयोजक स्वामी स्वदेशानन्द ब्रह्म गिरि महाराज अपने संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आंध्रप्रदेश के प्रभारी स्वामी अखंडानंद महाराज तथा राष्ट्रीय महामंत्री एवं असम प्रदेश के प्रभारी स्वामी डॉ. बिजन भट्टाचार्य, अंतर्राष्ट्रीय सन्त बौद्धिक मंच के राष्ट्रीय सचिव तथा सिक्किम प्रदेश प्रभारी फिल्म डायरेक्टर प्रभात कुमार मोते, आर.एस.एस.के प्रचारक एडवोकेट रतन शर्मा के साथ पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर तथा दार्जलिंग जिले का भ्रमण कर संगठन का विस्तार किया।
स्वामी स्वदेशानन्द ब्रह्म गिरि महाराज दार्जलिंग में चार दिनों के प्रवास के दौरान चाय बागानों में भ्रमण कर चाय बागानों में कार्यरत मजदूरों से भेट कर उनसे चर्चा कर उनका हाल – चाल जाना। साथ ही स्वामी जी अपने पदाधिकारियों के साथ सोना टी. नामक चाय की फैक्ट्री पहुंचे जहां फैक्ट्री के मैनेजर हरिराम चौधरी के द्वारा अपने कर्मचारियों के साथ स्वामी स्वदेशानन्द ब्रह्म गिरि महाराज तथा उनके पदाधिकारियों का स्वागत किया गया।
मैनेजर ने बताया की बागानों से तोड़कर जो पत्तियाँ लाई जाती है इस पत्तियों से फैक्ट्री में सुपर क्वालिटी की दार्जलिंग टी. तथा रोहिणी टी. नामक चाय की पत्ती का उत्पादन किया जाता है। स्वामी स्वदेशानन्द ब्रह्म गिरि महाराज ने दार्जलिंग वासियों से उनके स्वस्थ रहने का राज पूछा तो उन्होने बताया कि उनके द्वारा दार्जलिंग टी. का उपयोग सुबह और शाम को प्रतिदिन किया जाता है। इसलिए वे हमेशा स्वस्थ रहते हैं। फैक्ट्री के मैनेजर ने बताया कि यहाँ की चाय में किसी भी प्रकार का केमिकल नही मिलाया जाता शुद्ध पत्तियों की चाय का उत्पादन होता है जो विदेशों में निर्यात किया जाता है।
इस चाय से शरीर में ताजगी आती है और शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है तथा शरीर स्वस्थ रहता है। स्वामी स्वदेशानन्द ब्रह्म गिरि महाराज ने दार्जलिंग की प्रशंसा करते हुए कहा कि यदि भारत का कहीं स्वर्ग है तो ओ दार्जलिंग है। दार्जलिंग पहुंच कर स्वामी स्वदेशानंद ब्रह्म गिरि महाराज ने दार्जलिंग के लोक प्रिय सांसद राजू बिष्ट से भी दूरभाष पर संगठन के विषय में विस्तार से चर्चा की। दार्जलिंग का अपना एक इतिहास है जो तिब्बती शब्द “दोर्जे” (वज्र/ बिजली) और “लिंग” (स्थान) से मिलकर बना है। 1835 में सिक्किम के राजा ने इसे ब्रिटिश ईष्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दिया था। अंग्रेजों ने दार्जलिंग को स्वास्थ्य केंद्र और चाय उत्पादन के लिए प्रमुख रूप से विकसित किया। मूल रूप से इस क्षेत्र में लेप्चा और भूटिया जैसी स्वदेशी जनजातियाँ रहती थी।
1835 में ब्रिटिश गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के प्रयासों से सिक्किम के राजा चोंग्याल ने दार्जलिंग के पहाड़ी क्षेत्र को एक सेनिटोरियम (स्वस्थ लाभ केंद्र ) के रूप में विकसित करने के लिए अंग्रेजों को उपहार स्वरूप सौंप दिया। 1840 में अंग्रेजों ने दार्जलिंग में चीन से लाए हुए चाय के पौधों की सफल खेती की। 1850 तक दार्जलिंग में बड़े पैमाने में कमर्शियल चाय बागान स्थापित हो गए। आज “दार्जलिंग चाय” अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और स्वाद के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। 1881में यातायात को सुगम बनाने दार्जलिंग हिमालयन रेल्वे शुरू की गई। जिसे “टॉय ट्रेन” भी कहा जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में दार्जलिंग के लोगों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात दार्जलिंग पश्चिम बंगाल राज्य का प्रमुख जिला बन गया। आज दार्जलिंग अपनी प्रकृतिक सुंदरता, बर्फ से ढंकी कंचनजंगा पर्वतमाला, चाय बागानों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण पहाड़ियों की “रानी” के नाम से जाना जाता है।
