रेवांचल टाइम्स मंडला वर्ष 2017-18 में पर्यावरण संरक्षण और हरित विकास के उद्देश्य से मंडला जिले में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के तहत बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाया गया था। शासन की मंशा थी कि अधिक से अधिक पौधे लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाया जाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित विरासत तैयार की जाए। लेकिन अब इसी महत्वाकांक्षी अभियान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। विशेष रूप से जनपद पंचायत मोहगांव में पौधरोपण कार्यक्रम से जुड़े वित्तीय अभिलेखों और समायोजन की स्थिति ने कई संदेह पैदा कर दिए हैं। प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2017-18 में जनपद पंचायत मोहगांव के अंतर्गत विभिन्न ग्राम पंचायतों में मनरेगा के माध्यम से व्यापक स्तर पर पौधरोपण कराया गया। तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं मनरेगा अधिकारी के मार्गदर्शन में ग्राम पंचायतों को आम, अमरूद, नींबू सहित अन्य प्रजातियों के पौधे उपलब्ध कराए गए। इन पौधों की खरीद मठीजा नर्सरी से की गई और इसके लिए ₹28,11,350 का भुगतान जनपद पंचायत कार्यालय के परफॉर्मेंस ग्रांट से संबंधित एजेंसी को किया गया। इसके अतिरिक्त 10 नवंबर 2018 को संचालक उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी, भोपाल को ₹2,48,375 का भुगतान किया गया। इस प्रकार कुल ₹30,59,725 की राशि जनपद पंचायत के एकल खाते से व्यय की गई।
यहीं से पूरा मामला सवालों के घेरे में आ जाता है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार मनरेगा मद से इस राशि का समायोजन होना था, लेकिन मनरेगा अधिकारी द्वारा केवल ₹15,40,856 का ही समायोजन कराया गया, जबकि ₹15,18,869 का समायोजन आज तक लंबित बताया गया है। यानी कुल भुगतान का लगभग आधा हिस्सा वर्षों बाद भी समायोजित नहीं हो सका।
कार्यालयीन पत्राचार से यह भी सामने आया है कि संबंधित देयकों की प्रतियां मनरेगा अधिकारी को उपलब्ध कराई गई थीं और लंबित समायोजन के लिए जनपद पंचायत कार्यालय द्वारा कई बार स्मरण पत्र जारी किए गए। इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 27 दिसंबर 2024 को जारी एक पत्र में पुनः मनरेगा अधिकारी को निर्देश दिया गया कि एक सप्ताह के भीतर शेष ₹15,18,869 की राशि जनपद कार्यालय के एकल खाते में जमा कर समायोजन सुनिश्चित किया जाए। लेकिन दस्तावेजों के अनुसार आज तक न तो राशि जमा हुई और न ही समायोजन की प्रक्रिया पूरी की गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि समायोजन वर्षों से लंबित था तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई की गई। क्या केवल पत्र जारी कर औपचारिकता निभाना ही प्रशासनिक जिम्मेदारी है यदि बार-बार पत्र लिखने के बाद भी राशि जमा नहीं हुई तो फिर जवाबदेही किसकी तय होगी आखिर सात-आठ वर्षों तक लंबित वित्तीय प्रकरण पर विभाग की चुप्पी कई प्रश्न खड़े करती है।
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब सामाजिक कार्यकर्ता संकट मोचन चंद्रोल ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत पूरे पौधरोपण कार्यक्रम से संबंधित जानकारी मांगी। बताया जाता है कि आवेदन के बाद करीब छह माह तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। लंबे इंतजार के बाद जो दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, वे भी अधूरे और धुंधले बताए जा रहे हैं। आवेदक का कहना है कि कई प्रतियां इतनी अस्पष्ट हैं कि उन्हें पढ़ना तक संभव नहीं है। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का प्रयास तो नहीं किया गया।
सूचना के अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यदि किसी आवेदक को समय पर स्पष्ट और पठनीय जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो यह न केवल अधिनियम की भावना के विपरीत माना जा सकता है, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार पौधरोपण के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए गए, लेकिन आज उन पौधों का वास्तविक अस्तित्व, उनकी जीवित स्थिति और रखरखाव की जानकारी भी स्पष्ट नहीं है। कई स्थानों पर लगाए गए पौधों का कोई चिन्ह दिखाई नहीं देता। ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता है कि जिन पौधों की खरीद के लिए लाखों रुपये खर्च किए गए, वे वास्तव में संबंधित ग्राम पंचायतों तक पहुंचे या नहीं, उनका रोपण हुआ या नहीं, और यदि हुआ तो उनकी निगरानी किसने की।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े वित्तीय प्रकरण में केवल कागजी पत्राचार पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यदि किसी अधिकारी द्वारा लंबे समय तक समायोजन नहीं किया गया, तो वित्तीय नियमों के अनुसार उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। साथ ही पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भुगतान, पौधों की आपूर्ति, वितरण, रोपण और समायोजन की पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थी या नहीं।अब यह मामला केवल लंबित समायोजन तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक जवाबदेही, सूचना के अधिकार के पालन और पौधरोपण अभियान की वास्तविकता जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़ गए हैं। यदि समय रहते इन सवालों के जवाब नहीं मिले तो पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण अभियान की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है। सामाजिक कार्यकर्ता ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। पौधों की खरीद, वितरण, भुगतान, ग्राम पंचायतवार रोपण, जीवित पौधों की वर्तमान स्थिति, लंबित समायोजन तथा सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराई गई अधूरी जानकारी की स्वतंत्र जांच कर दोषियों की जिम्मेदारी तय की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि आखिर वर्षों से लंबित ₹15,18,869 के समायोजन पर अब तक प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
यदि शासन पर्यावरण संरक्षण के नाम पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपये का हिसाब चाहता है, तो जनपद पंचायत मोहगांव के इस प्रकरण में भी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग है। जनता अब यह जानना चाहती है कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के नाम पर लगाए गए पौधे वास्तव में धरातल पर कितने बचे हैं और लाखों रुपये के इस प्रकरण में जिम्मेदार कौन है।
इनका कहना
कार्यालय से कितने पत्र जारी किए गए है मुझे जानकारी नही है चौरसिया मेडम के पास दस्तावेज रखे हुए है मेडम अभी छुट्टी पर हैं अभी तक संबंधित मनरेगा अधिकारी के द्वारा भुगतान नही किया गया है।
आशा डेहरिया
मनरेगा अधिकारी जनपद मोहगांव
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के नाम पर लाखो का पौधरोपण या कागज़ी खेल 15.18 लाख रुपये का समायोजन आज तक अधूरा, RTI में भी धुंधले दस्तावेज़,
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