मोबाइल कैमरा, जियो-टैगिंग और डिजिटल साक्ष्य संकलन पर कार्यशाला; ‘द लास्ट कीपर्स’ डॉक्यूमेंट्री ने बताई वनरक्षकों की अहम भूमिका
दैनिक रेवांचल टाइम्स — कान्हा। कान्हा टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण को और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से वनरक्षकों एवं मैदानी अमले के लिए 27 अगस्त को वन्यजीव फोटोग्राफी एवं फील्ड दस्तावेजीकरण विषय पर विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। वन्यजीव फोटोग्राफर एवं संरक्षण कार्यकर्ता सुप्रिया हरिंद्रवार ने प्रतिभागियों को फील्ड में आधुनिक तकनीक के बेहतर उपयोग का प्रशिक्षण दिया।
कार्यशाला में वनकर्मियों को मोबाइल कैमरे की विभिन्न सेटिंग्स, वन्यजीवों की नैतिक एवं जिम्मेदार फोटोग्राफी, जियो-टैगिंग और मौके पर महत्वपूर्ण साक्ष्यों के त्वरित संकलन की व्यावहारिक जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि जंगल में मिलने वाली छोटी से छोटी महत्वपूर्ण सूचना या साक्ष्य यदि व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जाए तो वह वन्यजीव संरक्षण, निगरानी और प्रबंधन में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
कागजों से आगे अब कैमरे में दर्ज होगा जंगल का सच
कार्यशाला के बाद प्रतिभागियों को बाहरी क्षेत्र में प्रायोगिक प्रशिक्षण भी दिया गया। वनरक्षकों ने वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की तस्वीरें लेने का अभ्यास किया। इसके साथ ही मोबाइल फोन के माध्यम से तस्वीरों के संपादन और उन्हें बेहतर तरीके से दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रखने की तकनीक भी सिखाई गई।
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल बेहतर तस्वीरें खींचना नहीं, बल्कि फील्ड में सामने आने वाली परिस्थितियों, वन्यजीवों, उनके आवास और संरक्षण गतिविधियों को तकनीकी रूप से प्रमाणिक एवं उपयोगी दस्तावेज में बदलना रहा।
‘द लास्ट कीपर्स’ में दिखी वनरक्षकों की मेहनत
कार्यशाला के समापन अवसर पर सुप्रिया हरिंद्रवार द्वारा कान्हा में फिल्माई गई लघु डॉक्यूमेंट्री ‘द लास्ट कीपर्स’ का प्रदर्शन किया गया। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण में दिन-रात मैदानी स्तर पर जुटे वन विभाग के अमले, विशेषकर वनरक्षकों की भूमिका को सामने रखा गया।
डॉक्यूमेंट्री निर्माण के दौरान वन विभाग के वनरक्षकों द्वारा दिए गए सहयोग और योगदान को भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया। जंगल की सुरक्षा, वन्यजीवों की निगरानी और संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले इन मैदानी कर्मियों की भूमिका को डॉक्यूमेंट्री ने प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया।
कार्यशाला के माध्यम से कान्हा के मैदानी अमले को यह समझाने का प्रयास किया गया कि आज के दौर में संरक्षण की लड़ाई केवल जंगल में गश्त तक सीमित नहीं है, बल्कि हर महत्वपूर्ण गतिविधि का तकनीकी और विश्वसनीय दस्तावेजीकरण भी उतना ही जरूरी है।
