छिंदवाड़ा में 15 दिनों में छह बच्चों की मौत… कमलनाथ भड़के, कहा- सरकार भ्रष्टाचार रोके और स्वास्थ्य के लिए कुछ करे।

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Six children died in Chhindwara in 15 days… Kamal Nath got angry, said- the government should stop corruption and do something for health.

छिंदवाड़ा: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में एक रहस्यमयी बीमारी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इस बीमारी से अब तक छह मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है। सभी बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखाई दिए हैं, जिससे चिंता बढ़ गई है।

बीमारी के लक्षण
शुरुआत में हल्का बुखार आता है। इसके बाद, बच्चे पेशाब करना बंद कर देते हैं। किडनी फेल होने से धीरे-धीरे मौत हो जाती है। ज़िला प्रशासन इस बीमारी के कारण और स्रोत का पता नहीं लगा पा रहा है। दिल्ली से एक मेडिकल टीम बुलाई गई है जो वर्तमान में जाँच कर रही है, लेकिन रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है। छिंदवाड़ा मेडिकल टीम की शुरुआती जाँच में दो कफ सिरप को संभावित कारण बताया गया है। नतीजतन, प्रशासन ने इन कफ सिरप पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। इस बीमारी के डर से माता-पिता अपने बच्चों को हल्का बुखार होने पर भी सीधे नागपुर ले जा रहे हैं। इसके कारण छिंदवाड़ा से नागपुर में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

कमलनाथ ने सरकार पर साधा निशाना…

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में महज 15 दिनों में छह मासूम बच्चों की जान चली गई। मौत का कारण किडनी फेल होना बताया गया था, लेकिन जांच में पता चला कि बच्चों को दी जाने वाली कफ सिरप ही इसकी वजह थी। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था की बदहाली का सबूत है। पहला मामला 24 अगस्त को सामने आया और पहली मौत 7 सितंबर को हुई। एक के बाद एक मौतें होती रहीं। लेकिन प्रशासन ने दवा पर प्रतिबंध लगाने में देरी की और तब तक छह मासूम बच्चों की मौत हो चुकी थी।

यह सरकार की घोर लापरवाही को उजागर करता है। साफ है कि मध्य प्रदेश सरकार का ध्यान आम लोगों की जिंदगी पर नहीं, बल्कि ठेकेदारी और कमीशनखोरी पर है। दवाओं की खरीद से लेकर अस्पतालों के प्रबंधन तक, हर जगह पैसों का खेल चल रहा है। अगर समय रहते दवा बंद कर दी जाती, तो इन मौतों को टाला जा सकता था। स्वास्थ्य सेवा की हालत इतनी खराब है कि बच्चों को उचित इलाज नहीं मिल पाया। खून की जांच से पता चला कि मासूम बच्चों की जान वायरल संक्रमण से नहीं, बल्कि दवा में गड़बड़ी से गई।

अब सवाल यह है कि दवाओं की गुणवत्ता की जाँच क्यों नहीं होती? बच्चों की मौत के बाद ही कार्रवाई क्यों होती है? स्वास्थ्य बजट कहाँ जा रहा है? यह त्रासदी सिर्फ़ छिंदवाड़ा की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत है। अगर सरकार सिर्फ़ विज्ञापनों और कमीशन पर ही ध्यान केंद्रित करती रही, तो और भी ज़्यादा मासूम लोग इस लापरवाही का शिकार होंगे। जनता को अब सरकार से जवाब माँगना होगा कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ कब सुधरेंगी।

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