13 साल पहले बने अतिरिक्त कक्ष आज तक नहीं आए शिक्षा के काम, जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी पर उठे सवाल।
दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।
आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। एक ओर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर आधारभूत सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिले के कई सरकारी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। कहीं बच्चे जर्जर और टपकती छत के नीचे पढ़ाई करने को मजबूर हैं तो कहीं सरकारी स्कूल भवनों पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर उन्हें मवेशी बांधने और भूसा रखने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार विकासखंड मोहगांव में सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2012-13 में जी.पी.एस. आश्रम इंग्लिश मीडियम गर्ल्स स्कूल, मोहगांव के लिए लगभग 6 लाख रुपये की लागत से दो अतिरिक्त कक्ष स्वीकृत किए गए थे। निर्माण एजेंसी ग्राम पंचायत मोहगांव थी, जबकि निर्माण की निगरानी एवं तकनीकी जिम्मेदारी सर्व शिक्षा अभियान के सहायक यंत्री और संबंधित उपयंत्री पर थी।
आरोप है कि लगभग 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह भवन पूर्ण रूप से उपयोग में नहीं आ सका। वर्तमान में भवन के तीन कमरों और बरामदे की स्थिति चिंताजनक है। स्थानीय ग्रामीण गोपाल दास बैरागी उर्फ भूरा द्वारा कथित रूप से भवन के दो कमरों में भूसा, एक कमरा में पैरा एवं अन्य सामग्री रखी गई है, जबकि बरामदे में मवेशी बांधे जा रहे हैं। यदि यह स्थिति सही है, वही अतिरिक्त कक्ष जो कि छत पूर्ण होने के वावजूद आज भी फर्स और प्लाटर का कार्य नही किया गया कार्य आज भी आधा अधूरा छोड़ दिया गया तो यह सरकारी संपत्ति के संरक्षण और शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जहां एक ओर यह अतिरिक्त भवन उपयोग से बाहर पड़ा है, वहीं दूसरी ओर मोहगांव क्षेत्र के कई विद्यालयों में बच्चे जर्जर भवनों और टपकती छतों के नीचे पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं। बारिश के मौसम में कक्षाओं में पानी टपकने से विद्यार्थियों और शिक्षकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सर्व शिक्षा अभियान के जिम्मेदार अधिकारी, जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी), सहायक यंत्री तथा संबंधित उपयंत्री निर्माण कार्यों की नियमित मॉनिटरिंग नहीं कर रहे हैं। यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई निर्माण कार्य आधे अधूरे रहने के बावजूद उन्हें अभिलेखों और पूर्ण दर्शा दिया जाता है। यदि ऐसा हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
स्थानीय लोगों के उठते सवाल
वही जब 13 वर्ष बाद भी अतिरिक्त कक्ष पूर्ण रूप से उपयोग में क्यों नहीं आ सके? तो ये किसकी जिम्मेदारी व जबाबदेही तय करती है
वही जब सरकारी भवन पर कथित कब्जे और उसके दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार कौन है?
वही दूसरी ओर जब बच्चे जर्जर भवनों में पढ़ रहे हैं तो उपयोग योग्य भवनों को खाली कराने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यह कार्यवाही कौन करेगा बड़ा सवाल हैं जहाँ निर्माण कार्यों की निगरानी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?
क्या विभाग अधूरे निर्माण कार्यों और उनकी गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराएगा?
शिक्षा बच्चों का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में आवश्यकता है कि जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और सर्व शिक्षा अभियान के जिम्मेदार अधिकारी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करें, सरकारी भवन को अतिक्रमणमुक्त कर विद्यार्थियों के उपयोग में लाएं तथा जर्जर स्कूल भवनों की तत्काल मरम्मत या पुनर्निर्माण सुनिश्चित करें, ताकि आदिवासी अंचल के बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
एक पक्के अतिरिक्त कक्ष के अंदर बड़ी मात्रा में पैरा/भूसा रखा हुआ दिखाई दे रहा है। कमरों में कृषि सामग्री और पुराना सामान रखा गया है, जिससे वे शैक्षणिक उपयोग में नहीं दिख रहे।
बरामदे में गोबर और मवेशी बांधने के निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, जो भवन के पशुशाला की तरह उपयोग होने का संकेत देते हैं। भवन की संरचना (कमरे, दरवाजे और बरामदा) से यह सरकारी स्कूल के अतिरिक्त कक्ष जैसा प्रतीत होता है, लेकिन वर्तमान में उसका शैक्षणिक उपयोग दिखाई नहीं देता।
तस्वीरों ने खोली शिक्षा विभाग की हकीकत
बच्चों के लिए बने अतिरिक्त कक्ष बने भूसा घर, बरामदे में बंध रहे मवेशी; टपकती छत के नीचे पढ़ने को मजबूर नौनिहाल”
वही रेवांचल टाइम्स की टीम ने कैमरे में कैद तस्वीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि जिस अतिरिक्त कक्ष का उपयोग विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए होना चाहिए था, वहां आज बड़ी मात्रा में भूसा और पैरा भरा हुआ है। बरामदे में गोबर और मवेशी बांधने के निशान साफ दिखाई दे रहे हैं। करोड़ों रुपये की सरकारी योजनाओं के बीच बच्चों के लिए बने भवन का इस प्रकार उपयोग होना शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
