ठगी के आरोपियों के बचाव में उतरी ‘दलाल पत्रकारिता’: क्या निवेशकों का पैसा डकारने वालों से साठगांठ हो गई?

Revanchal
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​दैनिक रेवांचल टाइम्स शहडोल / धनपुरी:
करोड़ों रुपये की ठगी और धारा 420 के गंभीर मामलों में नामजद आरोपियों को बचाने के लिए अब मीडिया के एक वर्ग का खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल शुरू हो गया है। हाल ही में एक समाचार पत्र में GNS Financial Services के पक्ष में पूरी वकालत करते हुए एक विस्तृत सफाईनामा छापा गया। इस लेख में गबन के आरोपियों से सवाल पूछने के बजाय, सच उजागर करने वाले निष्पक्ष पत्रकारों की नीयत और कार्यशैली पर ही उल्टे सवाल खड़े कर दिए गए। जिस तरह से जनता का खून-पसीना चूसने वाली कंपनी को ‘बेकसूर’ साबित करने का असफल प्रयास किया गया है, उससे साफ जाहिर होता है कि कलम की दलाली और ‘पेड न्यूज’ का बड़ा खेल खेला गया है।
​GNS के सफाईनामे के एक-एक बिंदु पर करारा प्रहार:
​1. “समाचार छापने से पहले बैंक स्टेटमेंट और डीमैट रिकॉर्ड की पड़ताल क्यों नहीं की?”
​करारा जवाब: पत्रकारिता का काम कोई समानांतर ‘फॉरेसिक ऑडिट’ या आयकर विभाग की रेड मारना नहीं होता। वित्तीय अनियमितताओं की बू आते ही मामला उजागर करना मीडिया का कर्तव्य है। यदि हर खबर छापने से पहले पत्रकार को आरोपियों के निजी बैंक खातों और डीमैट अकाउंट खंगालने का अधिकार दे दिया जाए, तो फिर ईडी, आईटी और पुलिस की क्या जरूरत? बैंक खाते और डीमैट रिकॉर्ड दबाकर बैठना और फिर जांच का बहाना बनाना ठगों का पुराना पैंतरा है।
​2. “500 करोड़, 250 करोड़ या 200 करोड़? हवा-हवाई आंकड़े उछालकर सनसनी फैलाई जा रही है”
​करारा जवाब: जब हजारों निवेशकों की जीवनभर की कमाई अचानक गायब हो जाती है, तो कुल घोटाला सैकड़ों करोड़ में ही आंका जाता है। आधिकारिक ऑडिट रिपोर्ट सामने न आने तक अनुमानित आंकड़े सामने आना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि यदि आंकड़ा 500 करोड़ का नहीं बल्कि 50 करोड़ का भी है, तो क्या वह ठगी नहीं है? आंकड़ों की बाजीगरी में उलझाकर असल घोटाले से ध्यान भटकाने की यह नाकाम कोशिश है।
​3. “जांच से पहले खबर छापने से कंपनी की साठ-प्रतिष्ठा और निवेशकों का नुकसान होता है”
​करारा जवाब: कंपनी की साख मीडिया की खबरों से नहीं, बल्कि निवेशकों के पैसे न लौटाने और बाजार में धोखाधड़ी करने से डूबती है। जब निवेशक रोज दफ्तरों के चक्कर काट रहे हों और उनका भुगतान अटक जाए, तब साख बचानी याद आती है? उल्टे निष्पक्ष पत्रकारों पर दोष मढ़ना कि ‘उनकी खबर से नुकसान हो रहा है’, पूरी तरह हास्यास्पद और अपनी नाकामियों को छुपाने का जरिया है।
​4. “पुलिस को निष्पक्ष जांच करने से किसने रोका? मीडिया खुद जज क्यों बन रहा है?”
​करारा जवाब: जब-जब बड़े घोटाले होते हैं, तब-तब आरोपी यही रटा-रटाया राग अलापते हैं कि “पुलिस को काम करने दो”। इतिहास गवाह है कि अगर मीडिया घोटालों को प्रमुखता से न उठाए, तो पुलिस और प्रशासन की फाइलें धूल फांकती रह जाती हैं। मीडिया जज नहीं बन रहा, बल्कि सोए हुए प्रशासन को जगाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की आवाज बन रहा है।
​5. “क्या आरोपी और पीड़ित दोनों का पक्ष सुनना पत्रकारिता का धर्म नहीं है?”
​करारा जवाब: निष्पक्षता का मतलब अपराधियों और ठगों को सुरक्षा कवच प्रदान करना नहीं होता। जो लोग पहले से ही 420 और धोखाधड़ी के मामलों में दागदार रहे हैं, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड जगजाहिर है, उनके लिए पूरे पन्ने का ‘सफाईनामा’ छापना निष्पक्षता नहीं बल्कि ‘स्पॉन्सर्ड/पेड न्यूज’ की श्रेणी में आता है।
​ठगों के ‘पुराने आपराधिक रिकॉर्ड’ पर मौन क्यों?
​GNS और उसके कर्ता-धर्ताओं का इतिहास कोई दूध का धुला नहीं है। धोखाधड़ी, जालसाजी और वित्तीय हेरफेर (धारा 420) के मामलों में नामजद रहे लोगों के बचाव में अचानक यह ‘सफाई तंत्र’ सक्रिय हो गया है। जिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की जमा पूंजी डूब गई, जो आज अपने ही पैसों के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, उनके आंसुओं का सौदा करके आरोपियों की वकालत करना किसी भी दृष्टिकोण से पत्रकारिता नहीं कही जा सकती।


​जनता की अदालत में सीधा सवाल:
​अगर पत्रकार अदालत का फैसला आने और पुलिस जांच खत्म होने का इंतजार करते बैठ जाएं, तो देश का कोई भी घोटाला (चाहे वह सड़क निर्माण का भ्रष्टाचार हो, राशन घोटाला हो या पोंजी स्कीम की ठगी) कभी जनता के सामने नहीं आ पाएगा!
​कानून और पुलिस अपना काम करेगी, लेकिन ठगी के आरोपियों की ढाल बनने वाले और बिके हुए पैरोकारों से अब जनता सीधा हिसाब मांगेगी—”खबरों में सच दिखाओ, गबन करने वालों की दलाली बंद करो!”

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