
आबकारी विभाग के संरक्षण में फल-फूल रहा अवैध शराब का कारोबारधार्मिक नगरी मंडला में खुलेआम बिक रही शराब, जनता पूछ रही सवाल
रेवांचल टाइम्स मंडला। मां नर्मदा की पावन धारा, संतों-महात्माओं की तपोभूमि और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र माने जाने वाला मंडला जिला इन दिनों एक सवाल के केंद्र में है। जिस नगरी को धार्मिक महत्व और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए विशेष पहचान दी गई, जहां नर्मदा तट से पांच किलोमीटर की परिधि में शराब बिक्री पर प्रतिबंध लागू किया गया, वहीं आज खुलेआम अवैध शराब कारोबार फलता-फूलता नजर आ रहा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि अब लोग खुलकर यह सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर यह कारोबार किसके संरक्षण में संचालित हो रहा है और जिम्मेदार विभाग इसकी रोकथाम में असफल क्यों साबित हो रहा है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार जानकारों कि करोड़ों रुपये में शराब ठेका लेने वाले ठेकेदार अब केवल अधिकृत दुकानों तक सीमित नहीं रह गए हैं। आरोप हैं कि शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक शराब बिक्री का एक समानांतर नेटवर्क तैयार कर लिया गया है, जिसके माध्यम से हर गली, मोहल्ले और गांव तक शराब पहुंचाई जा रही है। स्थिति यह है कि कई स्थानों पर ग्राहक को शराब दुकान तक जाने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। एक फोन कॉल पर शराब घर तक पहुंचाने की व्यवस्था खुलेआम संचालित होने की चर्चाएं आम हैं। नगर उपनगरीय क्षेत्रो और हाईवे में संचालित ढाबे शाम होते ही मय खानों में तब्दील हो जाते है जैसे कि इन्हें आबकारी विभाग और पुलिस विभाग पीने पिलाने का लाइसेंस दे दिया है। इन ढाबों हर ब्रांड की शराब उपलब्ध होती है और लाइसेंसी शराब दूकान से कम रेट में भी शराब मिल रही है पर ये कैसे संभव है जहाँ दूकानों से भी कम कीमत की शराब इन ढाबों में दी जा रही आख़िर कार शराब नगर और इन ढाबों तक पहुँच कैसे रही है ये बड़ा सवाल हैं और इसके पीछे किसका संरक्षण है। सबसे गंभीर बात यह है कि यह सब उस जिले में हो रहा है जिसकी पहचान धार्मिक नगरी और मां नर्मदा की आस्था से जुड़ी हुई है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों और नर्मदा तट के आसपास भी शराब की उपलब्धता किसी से छिपी नहीं है। अनेक स्थानों पर शाम ढलते ही चाय-पान की दुकानें, अंडा सेंटर, ढाबे और किराना दुकानें कथित रूप से शराब बिक्री के अड्डों में तब्दील हो जाते हैं। यदि आम नागरिकों को इन स्थानों की जानकारी है तो फिर आबकारी विभाग को इसकी जानकारी नहीं होना अपने आप में बड़ा प्रश्न है। और यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
वही शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में यह चर्चा भी आम हो चुकी है कि अवैध शराब बेचने वालों के बीच एक कथन खुलेआम सुनाई देता है—“ठेकेदार की शराब बेचो, कोई कार्रवाई नहीं होगी।” यह कथन कितना सही है और कितना गलत, इसकी जांच होना आवश्यक है, लेकिन यदि इस प्रकार की बातें खुलेआम कही जा रही हैं तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जनता के बीच यह धारणा बनना कि कुछ लोगों को संरक्षण प्राप्त है, कानून के प्रति विश्वास को कमजोर करता है।
आरोप यह भी हैं कि कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रहती है। छोटे स्तर पर कुछ प्रकरण बनाकर विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी होने का दावा कर देता है, लेकिन अवैध कारोबार के बड़े नेटवर्क तक शायद ही कभी कार्रवाई पहुंचती दिखाई देती है। यही कारण है कि वर्षों से अवैध शराब बिक्री की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन कारोबार कम होने के बजाय लगातार बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यदि कार्रवाई प्रभावी होती तो प्रतिबंधित क्षेत्रों में शराब की उपलब्धता और कथित होम डिलीवरी जैसे नेटवर्क विकसित ही नहीं हो पाते।
इन दिनों पुलिस विभाग द्वारा समय-समय पर अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई की खबरें सामने आ रही हैं। पुलिस कई मामलों में शराब जब्त कर आरोपियों पर प्रकरण भी दर्ज कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि केवल पुलिस की कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान कैसे होगा। आबकारी विभाग, जो इस पूरे विषय का प्रमुख जिम्मेदार विभाग है, उसकी सक्रियता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जनता जानना चाहती है कि जिन क्षेत्रों में अवैध बिक्री की शिकायतें वर्षों से मिल रही हैं, वहां लगातार और व्यापक कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा शराब की कीमतों को लेकर सामने आ रहा है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि कई स्थानों पर शराब निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से अधिक कीमत पर बेची जा रही है। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल उपभोक्ताओं के साथ आर्थिक शोषण नहीं बल्कि नियमों का खुला उल्लंघन भी है। इसके बावजूद ऐसे मामलों में बड़ी कार्रवाई सामने नहीं आना कई तरह के संदेह पैदा करता है।
अवैध नेटवर्क के विस्तार के साथ नकली शराब की आशंका भी बढ़ जाती है। जब शराब अधिकृत दुकानों के बजाय अनधिकृत माध्यमों से बेची जाती है तो उसकी गुणवत्ता और प्रामाणिकता पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध शराब कारोबार केवल राजस्व की हानि का विषय नहीं है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य और जनसुरक्षा से जुड़ा मामला भी है। यदि कहीं नकली या मिलावटी शराब की बिक्री हो रही हो तो उसके परिणाम जानलेवा साबित हो सकते हैं।
धार्मिक दृष्टि से भी यह विषय अत्यंत संवेदनशील है। मां नर्मदा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। देशभर से श्रद्धालु नर्मदा दर्शन, स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए मंडला पहुंचते हैं। शासन द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करने का उद्देश्य भी धार्मिक वातावरण की पवित्रता और गरिमा बनाए रखना था। लेकिन यदि उन्हीं क्षेत्रों में खुलेआम शराब उपलब्ध हो रही है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी आहत करने वाला विषय है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि वास्तव में प्रशासन और आबकारी विभाग अवैध कारोबार के खिलाफ गंभीर हैं तो जिलेभर में व्यापक अभियान चलाकर उन सभी स्थानों की जांच की जानी चाहिए जहां शराब की अवैध बिक्री की शिकायतें मिल रही हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में शराब पहुंचाने वाले नेटवर्क के पीछे कौन लोग हैं और उन पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
आज आवश्यकता केवल कागजी दावों और औपचारिक कार्रवाई की नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी अभियान की है। जनता यह जानना चाहती है कि धार्मिक नगरी मंडला को आखिर शराब माफियाओं के हवाले क्यों छोड़ा जा रहा है नर्मदा तट की गरिमा, धार्मिक आस्था और कानून व्यवस्था की रक्षा के लिए जिम्मेदार विभागों को जवाब देना होगा। क्योंकि जब प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी शराब आसानी से उपलब्ध हो, जब अवैध बिक्री की चर्चाएं आम हों और जब कार्रवाई के बावजूद कारोबार बढ़ता दिखाई दे, तब सवाल केवल अवैध शराब का नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही का बन जाता है।
अब निगाहें प्रशासन, आबकारी विभाग और शासन पर हैं। देखना यह होगा कि जनता के इन सवालों का जवाब कार्रवाई के रूप में मिलता है या फिर अवैध शराब कारोबार पर उठते सवाल फाइलों और दावों के बीच ही दबकर रह जाते हैं।
