रेवांचल टाइम्स निवास मंडला निवास तहसील में इन दिनों कृषि भूमि पर अवैध प्लाटिंग का खेल खुलेआम चल रहा है। भू-माफियाओं और कथित कालोनाइजरों ने नियम-कानून को ठेंगा दिखाते हुए उपजाऊ कृषि भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर बेचने का धंधा शुरू कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि बिना डायवर्शन, बिना नक्शा स्वीकृति और बिना किसी वैधानिक अनुमति के कॉलोनियां बसाई जा रही हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों की आंखों पर मानो पट्टी बंधी हुई है।

सूत्रों ने प्राप्त जानकारी अनुसार निवास क्षेत्र में लगभग आधा दर्जन स्थानों पर कृषि भूमि को आवासीय कॉलोनी में तब्दील किया जा रहा है। न तो नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से ले-आउट स्वीकृत कराया गया है और न ही नगर परिषद से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लिया गया है। इसके बावजूद प्लाटों की खरीद-फरोख्त धड़ल्ले से जारी है। सवाल यह है कि जब पूरा खेल खुलेआम चल रहा है तो आखिर प्रशासन को यह दिखाई क्यों नहीं दे रहा।
कानून फाइलों में कैद, जमीन पर माफियाओं का राज
नियम स्पष्ट हैं कि कृषि भूमि को आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में लाने से पहले राजस्व विभाग से डायवर्शन कराना अनिवार्य है। इसके बाद नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से कॉलोनी का नक्शा और ले-आउट पास कराना होता है। सड़क, नाली, बिजली, पार्क, खेल मैदान और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ती है।
लेकिन निवास में इन नियमों को खुलेआम रौंदा जा रहा है। भू-माफिया पहले कृषि भूमि खरीदते हैं, फिर उसे छोटे-छोटे प्लाटों में काटकर बेच देते हैं। न कोई स्वीकृति, न कोई बुनियादी सुविधा और न कोई जवाबदेही। खरीदारों को सुनहरे सपने दिखाकर उनकी जीवनभर की कमाई दांव पर लगाई जा रही है।
कॉलोनियां बस गईं, लेकिन सड़क-नाली तक नहीं
जानकारी के अनुसार कई कथित कॉलोनियों में आज तक न पक्की सड़क बनी है, न नाली और न ही पेयजल की कोई स्थायी व्यवस्था है। बिजली के खंभे तक नहीं लगाए गए हैं। बच्चों के लिए खेल मैदान और पार्क की भूमि आरक्षित करना तो दूर, पूरी जमीन को प्लाटों में बदल दिया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में इन क्षेत्रों में कोई विवाद या सुविधा संबंधी समस्या आती है तो उसका खामियाजा सीधे उन लोगों को भुगतना पड़ेगा जिन्होंने मेहनत की कमाई लगाकर प्लाट खरीदे हैं।
पटवारी की जांच हुई, फिर मामला दबा क्यों।
स्थानीय नागरिकों की शिकायत पर हल्का पटवारी ने जांच कर पंचनामा और प्रतिवेदन भी तैयार किया था। जांच रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजी गई। इसके बाद कुछ भूमि के क्रय-विक्रय पर रोक लगाने की कार्रवाई भी हुई।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच में अनियमितताएं मिली थीं तो फिर आगे कार्रवाई क्यों नहीं हुई जिन भूमियों पर रोक लगाई गई, वहां आज भी निर्माण कार्य जारी है। मकान बन रहे हैं, प्लाट बिक रहे हैं और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
क्या भू-माफियाओं को मिला राजनीतिक संरक्षण
क्षेत्र में चर्चा का विषय यह है कि आखिर इतनी बड़ी अवैध गतिविधियां बिना संरक्षण के कैसे संचालित हो सकती हैं? लोगों का कहना है कि राजस्व विभाग, नगर परिषद और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है, ऐसा मानना मुश्किल है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भू-माफियाओं को किसी प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षण का सहारा प्राप्त है या फिर जिम्मेदार विभागों की मिलीभगत से पूरा खेल संचालित हो रहा है हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी संदेह को और गहरा कर रही है।
आम जनता के साथ हो सकती है बड़ी ठगी
बिना वैधानिक स्वीकृति वाली कॉलोनियों में प्लाट खरीदने वाले लोगों को भविष्य में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यदि प्रशासन कार्रवाई करता है तो निर्माण कार्य रुक सकते हैं, नक्शे निरस्त हो सकते हैं और कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का होगा जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई इन प्लाटों में निवेश की है।
जिला प्रशासन से बड़ी कार्रवाई की मांग
स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि निवास क्षेत्र में कृषि भूमि पर हो रही सभी प्लाटिंग की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। जिन भूमियों का डायवर्शन नहीं हुआ है, वहां तत्काल निर्माण और बिक्री पर रोक लगाई जाए। साथ ही अवैध कॉलोनियां विकसित करने वाले कालोनाइजरों के खिलाफ राजस्व, नगर तथा ग्राम निवेश और अन्य संबंधित कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई की जाए।
निवास में अवैध कॉलोनियों का यह खेल अब प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि व्यवस्था की साख का सवाल बन चुका है। सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन भू-माफियाओं के इस साम्राज्य पर बुलडोजर चलाएगा या फिर नियम-कानून केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।
