नैनपुर राजस्व विभाग का ‘काला अध्याय’: ‘बेदखली के आदेश’ बने माफिया के बनें खिलौने, कानून पर हावी हुआ ‘साठ-गांठ’ का तंत्र

Revanchal
4 Min Read

तहसीलदार कार्यालय में फाइलों का ‘कोमा’ और माफिया का ‘राज’; जनता दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर

दैनिक रेवाँचल टाईम्स – मंडला, जिले के विकास खंड नैनपुर का राजस्व विभाग इस समय एक अभूतपूर्व प्रशासनिक पतन के दौर से गुजर रहा है। भू-माफियाओं के सामने नतमस्तक हो चुका यह विभाग अब केवल एक दफ्तर नहीं, बल्कि अवैध गतिविधियों का ‘संरक्षण गृह’ बनता जा रहा है। सरकारी जमीनों पर माफिया द्वारा फसल बोने की हिम्मत और तहसीलदार कार्यालय की चुप्पी ने नैनपुर में कानून के शासन पर बड़े प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।

खसरा नंबर 197/2: प्रशासन की फाइलों में ‘न्याय’, जमीन पर माफिया का ‘अधिपत्य’

नैनपुर का खसरा नंबर 197/2 अब केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि प्रशासन की कार्यक्षमता का लिटमस टेस्ट बन चुका है। पूर्व तहसीलदार द्वारा इस जमीन को सरकारी घोषित कर ‘बेदखली के आदेश’ जारी किए गए थे, लेकिन वर्तमान प्रशासनिक अमले की उदासीनता ने उन आदेशों को महज़ कागज़ का टुकड़ा बना दिया है। माफिया ने न केवल अवैध नामांतरण करवाया, बल्कि बिना सक्षम प्राधिकारी (कलेक्टर) की अनुमति के डायवर्जन का खेल खेलकर कॉलोनी काट दी। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बेदखली के स्पष्ट आदेशों के बाद भी वहां फसल की बुवाई की जा रही है, जो प्रशासन को एक सीधी और खुली चुनौती है।

तहसीलदार कार्यालय: जहाँ ‘समय-सीमा’ एक मजाक, और फरियादी ‘लाचार’

नैनपुर तहसीलदार कार्यालय में भ्रष्टाचार और लापरवाही की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब वहां ‘सुशासन’ की उम्मीद करना ही बेमानी है। आम नागरिकों के काम समय-सीमा में होना तो दूर, फाइलों को जानबूझकर लंबित रखा जा रहा है। वकील बिरादरी का स्पष्ट आरोप है कि मामलों को निपटाने के बजाय ‘तारीख पे तारीख’ का खेल खेलकर फरियादियों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। CM हेल्पलाइन की शिकायतों के बावजूद अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई सुधार न होना, यह सिद्ध करता है कि राजस्व विभाग के मुखिया का ध्येय माफिया का पालन-पोषण करना ही रह गया है।

‘मोहरे की बलि’ बनाम ‘असली गुनाहगार’: सिस्टम का दोगलापन

प्रशासन द्वारा एक पटवारी के निलंबन को ‘बड़ी कार्रवाई’ बताकर प्रचारित करना केवल जनता की आँखों में धूल झोंकने का प्रयास है। इस पूरे घोटाले में राजस्व विभाग के उच्च अधिकारियों और माफिया के बीच का ‘सांठ-गांठ’ का तंत्र स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यदि नामांतरण गलत था, तो उन हस्ताक्षर करने वाले अधिकारियों पर FIR क्यों नहीं हुई? क्यों उन बड़े सफेदपोश चेहरों को अभयदान दिया जा रहा है, जो इस पूरे खेल के असली सूत्रधार हैं?

अंतिम चेतावनी: क्या प्रशासन जागेगा या जन-विस्फोट का इंतज़ार है?

नैनपुर की सरकारी जमीनें लुट रही हैं और प्रशासन ‘मौन व्रत’ धारण कर बैठा है। यह मौन अब किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। यदि खसरा नंबर 197/2 से माफिया का कब्जा तत्काल नहीं हटाया गया और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जनता के आक्रोश को रोक पाना किसी के लिए संभव नहीं होगा। नैनपुर अब जाग चुका है; अब या तो कानून का राज होगा, या फिर इस भ्रष्ट सिस्टम की नींव हिलना निश्चित है।

👁️ 7 views Views
Share This Article
Translate »