वरिष्ठ अधिकारियों तक शिकायत पहुंचने के बाद ही कार्रवाई होने का आरोप, कई मामलों को लेकर पुलिस की भूमिका पर प्रश्नचिह्न
दैनिक रेवाँचल टाईम्स – धूमा (सिवनी)। जिले के धूमा थाना क्षेत्र में एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्षेत्र के कई पीड़ितों का आरोप है कि थाने में दिए गए आवेदनों पर समय रहते वैधानिक कार्रवाई नहीं की जाती और कई मामलों में शिकायतकर्ताओं को वरिष्ठ अधिकारियों के दरवाजे खटखटाने के बाद ही एफआईआर दर्ज हो पाती है। इससे आम लोगों में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार धूमा थाना क्षेत्र के ग्राम घूरवाड़ा में हाल के तीन महीनों में लगभग 10 से 12 स्थानों पर चोरी की घटनाएं हुईं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन मामलों में समय पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बताया जाता है कि एक चोरी भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के तहसील उपाध्यक्ष की दुकान में भी हुई थी। आरोप है कि इस मामले में भी स्थानीय स्तर पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई और वरिष्ठ स्तर से पुलिस अधीक्षक सिवनी को जानकारी दिए जाने के बाद पुलिस सक्रिय हुई तथा एफआईआर दर्ज की गई। वहीं अन्य चोरी के मामलों में अब तक कार्रवाई लंबित होने की बात सामने आ रही है।
इसी प्रकार अनुसूचित जाति वर्ग की एक महिला की मारपीट, जातिसूचक अपमान एवं अन्य गंभीर आरोपों को लेकर धूमा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप है कि उसकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया और उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि ऐसे छोटे मामलों में रिपोर्ट दर्ज नहीं होती। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय, कलेक्टर जनसुनवाई तथा अजाक थाना सहित विभिन्न स्तरों पर शिकायत की, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। अंततः महिला को जबलपुर स्थित पुलिस महानिरीक्षक कार्यालय में आवेदन देना पड़ा। आरोप है कि
लगभग 77 दिन पश्चात उसके आवेदन पर एफआईआर दर्ज की गई। जबकि पुलिस के वरिष्ठ कार्यालय से मामले की जांच के आदेश किया जा चुके थे साथ ही एफआईआर दर्ज करने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय भोपाल से भी पत्र जारी हो चुका था इसके बावजूद जांच की फाइल और कार्रवाई का पत्र न जाने कहां दबा दिया गया ।
ऐसा ही एक और अन्य मामले में भी शिकायतकर्ता का दावा है कि आवेदन देने के लगभग 100 दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई एक-दो घटनाएं नहीं हैं, बल्कि ऐसे कई मामलों में समय पर वैधानिक कार्रवाई नहीं होने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं।
इस बीच धूमा थाने में पदस्थ एक बीट प्रभारी एएसआई पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पीड़ित महिला का आरोप है कि संबंधित अधिकारी ने उस पर सीएम हेल्पलाइन की शिकायत बंद कराने का दबाव बनाया तथा गलत निराकरण दर्ज कर मोबाइल लेकर शिकायतें बंद कर दी गई। और बाद में उन्हें लगाई गई शिकायतों को बंद करने दबाव डाला गया। यह भी कहा कि तुम्हारे आवेदन पर एफआईआर तो दर्ज नहीं होगी। यदि यह आरोप हैं तो यह न केवल शिकायत निवारण व्यवस्था की निष्पक्षता बल्कि पुलिस की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। लापरवाही के मामले पर एएसआई की शिकायत जबलपुर आईजी कार्यालय में भी की गई है।
क्षेत्र के नागरिकों एवं सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि पुलिस समय पर शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई करे तो लोगों को बार-बार वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। उनका कहना है कि पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी निष्पक्ष, त्वरित और कानूनसम्मत कार्रवाई करना है।
अब देखना यह होगा कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराते हैं या नहीं तथा यदि जांच में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है। क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि इस पूरे मामले में पारदर्शी जांच कराकर दोषियों के विरुद्ध उचित कदम उठाए जाएंगे, जिससे आम जनता का पुलिस व्यवस्था पर विश्वास कायम रह सके।
वही लखनादौन एसडीओपी का यह कहना है-
“यदि ऐसा कोई मामला हुआ है कि किसी की एफआईआर नहीं लिखी जाती है तो शिकायतकर्ता वरिष्ठ कार्यालय को शिकायत कर सकता है
कुछ मामलों में ऐसा लगता है की जांच की आवश्यकता है तो जांच की जाती है बीएनएस में प्रावधान है की 7 वर्ष से कम की सजा में 14 दिनों की जांच की जा सकती है। वैसे तत्काल एफआईआर करने का प्रयास किया जाता है और यदि अनावश्यक रूप से लगता है कि एफआईआर में विलंब हो रहा है तो वरिष्ठ कार्यालय को शिकायत कर सकते हैं।”
अपूर्व भलावी एसडीओपी लखनादौन
