डिजिटल कैद में 72 घंटे… रिटायर्ड शिक्षिका से 70 लाख की फिरौती की मांग
मुहम्मद अनवार बाबू, स्थानीय संपादक, रेवांचल टाइम्स
शहर के शांत माने जाने वाले बाई का बगीचा इलाके में 6 दिसंबर की सुबह एक फोन कॉल आता है…और इसके साथ ही शुरू होती है एक ऐसी डिजिटल कैद, जिसके भीतर एक रिटायर्ड शिक्षिका और उनके पति अगले 72 घंटे तक सांस रोके जीते रहे।
कॉल करने वाला खुद को एटीएस अधिकारी बताता है। आरोप गंभीर…आपके खाते से पुलवामा हमले से जुड़े नेटवर्क में 70 करोड़ का ट्रांज़ैक्शन हुआ है।
जिस देश में आतंक का नाम लोगों के होश उड़ा देता है, वहां इस बुजुर्ग दंपती के लिए ये शब्द बिजली बनकर गिरे।
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डर, अविश्वास और फिर डिजिटल अरेस्ट…
- कुछ मिनटों की पूछताछ के बाद ठगों ने महिला को वीडियो कॉल पर ले लिया…यही था असली ज़ंजीर डालने का पल।
- मोबाइल में Signal ऐप डाउनलोड करवाया गया, एक फर्जी ATS ग्रुप में जोड़ा गया।
- अब हर आवाज़, हर हरकत, हर सांस पर उन डिजिटल गुंडों की नज़र थी।
- तीन दिन तक दंपती के घर का पर्दा कब खुलेगा…यह भी ठगों की अनुमति पर निर्भर था।
- खुद को अधिकारी बताने वाले ये साइबर अपराधी अब कानून नहीं, बल्कि डर की भाषा बोल रहे थे…
- नाम हटवाना है? सज़ा से बचना है? तो 70 लाख जमा करो… तुरंत।
- सोचिए, एक जिंदगी भर पढ़ाने वाली महिला, अपने ही देश के कानून के नाम पर कितना डरी होगी कि ठगी करने वाले नकली अधिकारी से पूछे बिना घर में पर्दा भी नहीं हटा रही थीं।
ठगों की चालबाज़ी: डर को मोड़कर धन में बदलने की कोशिश
- फ़िक्स्ड डिपॉज़िट तोड़कर पैसे एक तथाकथित आरबीआई खाते में जमा करने को कहा गया।
- यह वही मनोवैज्ञानिक खेल है…डर की तात्कालिकता, कानून का भय, और बुजुर्ग दंपती की असुरक्षा।
- इन्हीं तीन को जोड़कर ठगी की सबसे बड़ी पटकथा लिखी जाती है।
- लेकिन हर पटकथा का अंत ठगों के मुताबिक नहीं होता…
- मंच पर आते हैं एएसपी जितेंद्र सिंह…एक भूमिका जिसने कहानी पलट दी
- जब मामला पुलिस तक पहुँचा, एएसपी जितेंद्र सिंह सीधे मौके पर पहुँचे।
- उन्होंने खुद को महिला का रिश्तेदार बताया और ठग से बात की।
- और फिर वह निर्णायक वाक्य बोला जो किसी भी ठग के दिल में सायरन जैसा बजता है…
- हम आपके पिताजी बोल रहे हैं… चेहरा तो दिखाओ।
बस, इतना सुनना था कि दूसरी ओर सन्नाटा छा गया। ठग घबरा गए, कॉल काट दी, और पूरी फर्जी जांच एक झटके में ढह गई।
एएसपी सिंह ने साफ कहा…
समय पर जानकारी मिल गई, इसलिए न महिला को आर्थिक नुकसान हुआ और न कोई अनहोनी। आरोपियों की तलाश जारी है।
- एक सबक, जो हर नागरिक को समझना चाहिए
- डिजिटल युग में अपराध अब घर का दरवाज़ा तोड़कर नहीं आते…
- वे सीधे आपके फोन में घुसते हैं, भरोसे को हथियार बनाते हैं, और डर को मोहरा।
यह मामला सिर्फ एक ठगी की कोशिश नहीं, बल्कि यह चेतावनी है कि
साइबर क्राइम अब आतंक की भाषा बोलने लगा है।
लेकिन सौभाग्य से, इस बार एक समझदारी, एक संदेह, और एक पुलिस अधिकारी की हिम्मत ने
एक शिक्षिका की जीवनभर की कमाई और मानसिक शांति…दोनों बचा लीं।
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