दैनिक रेवांचल टाइम्स – भोपाल, सार्वजनिक जीवन में कुछ कार्यकाल ऐसे होते हैं जो समय की इस सामान्य गणना को अस्वीकार कर देते हैं। मध्यप्रदेश में संगठन मंत्री के रूप में हितानंद जी भाईसाहब का कार्यकाल इसी श्रेणी का रहा, जहाँ निवर्तन नहीं, बल्कि दायित्व की निरंतरता दिखाई देती है।
समकालीन राजनीति में दृश्यता, वक्तव्य और तात्कालिक परिणामों को नेतृत्व का मानक मान लिया गया है। ऐसे परिवेश में उनका कार्यकाल एक वैचारिक प्रतिवाद की तरह उभरता है। उनका नेतृत्व शोर से नहीं, संयम से पहचाना गया; मंच से नहीं, संगठनात्मक संरचना से प्रमाणित हुआ।
यह वह शैली है जो तत्काल तालियाँ नहीं बटोरती, पर संगठन की जड़ों को गहराई देती है।उन्होंने पद को अधिकार के रूप में नहीं, उत्तरदायित्व के रूप में जिया।
संगठन उनके लिए केवल व्यवस्थागत ढाँचा नहीं, बल्कि मूल्य-आधारित चेतना था। इसी कारण अनुशासन उनके यहाँ भय या नियंत्रण का साधन नहीं बना, बल्कि आत्मबोध से उपजा स्वाभाविक संस्कार रहा। उनकी दृढ़ता कभी कठोरता में परिवर्तित नहीं हुई; वह नैतिक विवेक के साथ चलती रही।
परिणामस्वरूप निर्णय आदेशात्मक कम और स्वीकार्य अधिक रहे।जहाँ तात्कालिक उपलब्धियाँ राजनीति को आकर्षक बनाती हैं, वहीं उन्होंने दीर्घकालिक संगठनात्मक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी। यह चयन लोकप्रियता की दृष्टि से सहज नहीं था, पर राष्ट्रकार्य की दृष्टि से अनिवार्य था।
ऐसे निर्णय तत्काल प्रशंसा से वंचित रह सकते हैं, किंतु दीर्घकाल में वही संगठन की रीढ़ सिद्ध होते हैं। उनका कार्यकाल घटनाओं से अधिक प्रक्रियाओं की शुद्धता और घोषणाओं से अधिक दृष्टि की स्पष्टता में स्मरण किया जाएगा।उनकी उपस्थिति ने संगठन को केवल कार्यशील नहीं, बल्कि विचारशील बनाया। कर्म की निरंतरता, विचार की शुचिता और उद्देश्य की स्पष्टता—इन्हीं तत्वों ने संगठन को अवसरवाद से दूर रखा और उसे मूल्य-केंद्रित बनाए रखा।
यह उपलब्धि आँकड़ों से नहीं मापी जाती; यह परंपरा बनकर आगे बढ़ती है।इसलिए निवर्तन का यह क्षण किसी विराम का संकेत नहीं है। व्यक्ति बदलते हैं, भूमिकाएँ परिवर्तित होती हैं, पर यदि दृष्टि सुरक्षित रहे, तो संगठन कालजयी होता है।
इस प्रसंग में औपचारिक शुभकामनाएँ नहीं, केवल यह प्रार्थना सार्थक है कि ईश्वर उन्हें राष्ट्रकार्य के पथ पर अक्षय ऊर्जा, स्थिर सुस्वास्थ्य और अविचल आत्मबल प्रदान करें—क्योंकि जिनके लिए राष्ट्र उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व और धर्म है, उनका दायित्व कभी समाप्त नहीं होता।
–शैलेन्द्र सिंह रघुवंशी ‘अधिवक्ता'(मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ट्रिब्यूनल एवं अधीनस्थ न्यायालय)
