राहत राशि कि जानकारी देने से क्यों बच रहे मंडला तहसीलदार हिमांशु भलावी? करोड़ो के ग़बन भ्रष्टाचार के लग रहे गंभीर आरोप

Revanchal
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प्रथम अपील में आदेश के बाद भी आरटीआई आवेदक को नहीं मिली सूचना,

धारा-8 का सहारा लेकर छिपाए जा रहे करोड़ों के मुआवजा वितरण के रिकॉर्ड!

दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला आदिवासी बाहुल्य जिले में भ्रष्टाचार ग़बन घोटाले जैसे सरकारी योजनाओं में आम बात हो चली है और जब जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात की जानकारियां लगती है तो वह भी बदनामी के डर से जांच की बात कहके आगे बढ़ते है और समय बीतता चला जाता हैं पर जांच पूरी नही होती बल्कि शिकायत की फ़ाइल कार्यालय में पड़ी धूल खाती नजर आती है और भ्रष्ट अधिकारियों को जांच के नाम पर भ्रष्टाचार करने की खुली छूट मिल जाती हैं।

ऐसा ही एक मामला मंडला तहसील के सामने आया है जहाँ राहत राशि मे फर्जीबाडे की बू आ रही जिसकी जानकारी मांगे जाने पर जानकारी न देते धाराओं में आवेदक को उलझाया जा रहा हैं। धारा-8 की आड़ में छिप रही राहत राशि की सच्चाई? मंडला तहसील पर उठे गंभीर सवाल
सरकार के द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 को शासन ने सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया था, ताकि आम नागरिक सरकारी योजनाओं और खर्चों का हिसाब मांग सकें। लेकिन मंडला तहसील कार्यालय में हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। यहां प्रथम अपीलीय अधिकारी के स्पष्ट आदेश के बावजूद लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानकारी देने से इनकार किया जा रहा है, जिससे पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।


सरकारी के द्वारा गरीबों के लिए चलाई जा रही महत्वाकांक्षी योजना आरबीसी 6/4 के तहत मांगी थी मुआवजा वितरण की जानकारी तहसील कार्यालय से किन किन हितग्राहियों को प्रदाय की गई जहाँ नियमानुसार आवेदक द्वारा दिनांक 13 जनवरी 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत कर वित्तीय वर्ष 2022 से आवेदन दिनांक तक प्राकृतिक आपदाओं, सर्पदंश, आकाशीय बिजली, नदी, तालाब एवं डेम में हुई आकस्मिक मौतों के मामलों में आरबीसी 6/4 के तहत वितरित मुआवजा राशि का विवरण मांगा गया था।


आवेदन में मृतकों के परिजनों को स्वीकृत मुआवजा राशि, लाभार्थियों के नाम-पते, स्वीकृति की तिथि तथा जिस खाते में राशि अंतरित की गई उसका विवरण एवं संबंधित अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं।
प्रथम अपील के आदेश के बाद भी नहीं मिली सूचना, आखिर क्या छिपा रहा तहसील कार्यालय?


प्रथम अपील में आदेश, फिर भी नहीं दी गई जानकारी समय सीमा में सूचना प्राप्त नहीं होने पर आवेदक ने 24 फरवरी 2026 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा-19 के तहत प्रथम अपील अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मंडला के समक्ष प्रस्तुत की।


सुनवाई के बाद प्रथम अपीलीय अधिकारी ने आदेश पारित करते हुए तहसीलदार एवं लोक सूचना अधिकारी मंडला को आवेदक को नियमानुसार जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि आवेदक को जानकारी प्रदाय की जाए।
इसके बावजूद आदेश के पालन के बजाय तहसील कार्यालय द्वारा पुनः 8 जून 2026 को पत्र जारी कर सूचना देने से इनकार कर दिया गया।

धारा-8 की आड़ में छिप रही राहत राशि की सच्चाई? मंडला तहसील पर उठे गंभीर सवाल
क्या धारा-8 बन गई है जानकारी रोकने का हथियार? तहसील कार्यालय ने अपने जवाब में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) का हवाला देते हुए मांगी गई जानकारी को “व्यक्तिगत प्रकृति” की बताते हुए देने से इनकार कर दिया।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सार्वजनिक धन से राहत और मुआवजा राशि वितरित की गई है तो उसके वितरण का विवरण किस प्रकार पूरी तरह निजी सूचना माना जा सकता है? यदि शासन की राशि सही पात्रों तक पहुंची है, तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में आखिर आपत्ति क्यों?

मुआवजा वितरण के रिकॉर्ड पर पर्दा, आरटीआई आवेदक को गुमराह करने के आरोप
क्या छिपाने की कोशिश हो रही है?
मामले में यह भी प्रश्न उठ रहा है कि यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश के बाद भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, तो आखिर ऐसा क्या है जिसे सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है?


आवेदक का आरोप है कि यदि मुआवजा वितरण के वास्तविक रिकॉर्ड सामने आते हैं तो करोड़ों रुपये के संभावित वित्तीय अनियमितताओं, फर्जी भुगतान और पात्र हितग्राहियों को वंचित किए जाने जैसे गंभीर मामलों का खुलासा हो सकता है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होना अभी शेष है, लेकिन सूचना न देने की प्रशासनिक जिद ने संदेहों को और गहरा जरूर कर दिया है। जहाँ जनता के पैसों का हिसाब मांगना गुनाह? मंडला तहसील में आरटीआई पर टकराव क्यों


श्योपुर घोटाले की याद फिर हुई ताजा
वही जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में वर्ष 2021 के दौरान बाढ़ राहत राशि वितरण में लगभग 2.57 करोड़ रुपये के गबन का मामला सामने आया था। जांच में फर्जी बैंक खातों में राहत राशि स्थानांतरित किए जाने के आरोप सामने आए थे। इस मामले में तत्कालीन तहसीलदार सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी।
ऐसे में मंडला में राहत राशि वितरण से जुड़े अभिलेखों को सार्वजनिक करने में हो रही अनिच्छा स्वाभाविक रूप से सवालों को जन्म दे रही है।


सूचना आयोग की चौखट तक पहुंचेगा मामला
वही आवेदक का कहना है कि प्रथम अपील के आदेश का पालन नहीं किए जाने के बाद अब वह मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग, भोपाल में द्वितीय अपील प्रस्तुत करेगा। वहां मामले की सुनवाई के दौरान यह तय होगा कि मांगी गई सूचना वास्तव में जनहित से जुड़ी है अथवा नहीं।


सबसे बड़ा सवाल…
यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो जानकारी देने से परहेज क्यों?
यदि राहत राशि सही हितग्राहियों तक पहुंची है, तो अभिलेख सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट किस बात की?
और यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेशों का पालन ही नहीं होगा, तो फिर सूचना का अधिकार अधिनियम का औचित्य क्या रह जाएगा?
जनता के पैसे से संचालित योजनाओं में पारदर्शिता कोई एहसान नहीं, बल्कि प्रशासन की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मंडला प्रशासन सूचना उपलब्ध कराकर उठ रहे सवालों का जवाब देता है या फिर मामला राज्य सूचना आयोग की दहलीज पर जाकर नई परतें खोलता है। यह देखना बाकी हैं।

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