दैनिक रेवांचल टाईम्स – मंडला
विश्व प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिज़र्व आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी पहचान—बाघ—खुद असुरक्षित नजर आ रहे हैं। एक ही माह में तीन शाबक सहित बाघों की मौत ने साफ कर दिया है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गंभीर चूक है। सवाल अब “कैसे हुआ” से आगे बढ़कर “जिम्मेदार कौन” पर आकर टिक गया है।
करोड़ों अरबों का बजट, फिर भी मौत क्यों? इसका जिम्मेदार कौन
कान्हा प्रबंधन को हर साल भारी भरकम फंड मिलता है—केंद्र, राज्य और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से। World Wide Fund for Nature (WWF) जैसी संस्थाएं भी संरक्षण के नाम पर सहयोग देती हैं। पर उस फंड का क्या सही उपयोग हो रहा ये देखने वाला कौन बाद सवाल
लेकिन हकीकत यह है कि:
गश्त कमजोर बताई जा रही है
मॉनिटरिंग सिस्टम कागजों तक सीमित दिख रहा है रेस्क्यू और मेडिकल रिस्पॉन्स में देरी के आरोप हैं, अगर इतना सब होने के बाद भी बाघ सुरक्षित नही और मर रहे हैं, तो यह सीधे-सीधे प्रबंधन की विफलता है। और कही न कही लापरवाही या फिर उदासीनता दिखाई पड़ रही है।
इन बाघो की मौत का जिम्मेदार कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या पार्क के फील्ड अधिकारी?
क्या उच्च वन अधिकारी?
या फिर पूरी व्यवस्था जो सिर्फ रिपोर्ट बनाकर जिम्मेदारी से बच जाती है?
जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला रुकने वाला नहीं।
पर्यटन पर भी संकट
कान्हा सिर्फ जंगल नहीं, बल्कि मंडला जिले की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
देश-विदेश से लोग यहां बाघ देखने आते हैं। पर अब पर्यटकों की संख्या दिन ब दिन गिर रही है लोग निराश होकर लौट रहे हैं।
लेकिन जब खबरें बाघों की मौत की आएंगी, तो सवाल उठेगा—
“जहां बाघ ही सुरक्षित नहीं, वहां पर्यटक क्यों आएंगे?”
यह स्थिति पर्यटन उद्योग, स्थानीय रोजगार और जिले की छवि—तीनों के लिए खतरे की घंटी है।
फंड जा रहा कहां? सबसे गंभीर सवाल—
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार बाघो के संरक्षण के लिए प्राप्त करोड़ो रूपये आखिर कहा जा रहे है प्रबंधन क्या अपनी जरूरतों को पूरी करने में लगी हुई है क्या जो कि वनों की सुरक्षा और जानवरों को संरक्षित करने करोड़ों रुपये का फंड आखिर खर्च किस पर हो रहा है? क्या ग्राउंड लेवल पर उसका सही उपयोग हो रहा है? बात वही की जंगल मे मोर नाचा पर देखा कौन बस यही बात समझ में आ रही है कि संरक्षण और संरक्षित के नाम पर जंगल के अंदर जो व्यय हो रहा है वह आखिर देख कौन रहा उसका हिसाब कौन ले रहा है कि बस कागजों में ही लेखा जोखा की जा रही है जो वन्य प्राणी संरक्षित है वह तो जानकारी लोगो तक पहुँच ही रही हैं।
क्या सिर्फ कागजी योजनाएं बनाकर राशि खपाई जा रही है?
क्या निगरानी तंत्र में पारदर्शिता की कमी है? अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले, तो यह मामला केवल लापरवाही नहीं बल्कि फंड के दुरुपयोग की ओर भी इशारा करता है।
अब क्या होना चाहिए?
हर मौत की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच
जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई
फंड के उपयोग का ऑडिट
ग्राउंड लेवल पर गश्त और मेडिकल सिस्टम को मजबूत करना
कान्हा की पहचान उसके बाघ हैं, और अगर वही खतरे में हैं, तो पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है।
अब वक्त है कि जिम्मेदारों को बेनकाब किया जाए—क्योंकि “संरक्षण” के नाम पर लापरवाही अब बर्दाश्त के बाहर
