घुघरी में CEO आवास पर अवैध कब्जा, राजस्व विभाग ने परिवार के नाम जारी किया पट्टा

Revanchal
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रेवांचल टाइम्स घुघरी मंडला जिले के घुघरी विकासखंड में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। जिस शासकीय आवास का निर्माण जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के निवास हेतु किया गया था, आज वह सरकारी कर्मचारी के कब्जे में है। इतना ही नहीं, आरोप है कि राजस्व विभाग की मिलीभगत से उस शासकीय भूमि का भू-अधिकार पत्र (पट्टा) भी संबंधित कर्मचारी के परिजनों के नाम जारी कर दिया गया। इस पूरे मामले ने सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।


सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार घुघरी ग्राम पंचायत स्थित उक्त भवन वर्षों से जनपद पंचायत के अधिकारियों के आवास के रूप में उपयोग में लाया जाता रहा है। शासन द्वारा बनाए गए इन आवासों का उद्देश्य यह था कि अधिकारी एवं कर्मचारी ब्लॉक मुख्यालय में रहकर जनता के कार्य समय पर कर सकें। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि अधिकांश अधिकारी कर्मचारि जिला मुख्यालय या निजी स्थानों पर निवास कर रहे हैं और सरकारी आवास या तो खाली पड़े हैं या जर्जर हो चुके हैं।

इसी लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का फायदा उठाकर कुछ प्रभावशाली लोगों ने सरकारी संपत्तियों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक जिस व्यक्ति ने इस आवास पर कब्जा किया है, वह स्वयं एक शासकीय कर्मचारी है। बताया जा रहा है कि उसका निजी मकान पहले से ही छिंदर क्षेत्र में बना हुआ है।

नियमों के अनुसार निजी आवास होने की स्थिति में कोई भी कर्मचारी शासकीय आवास का पात्र नहीं माना जाता। इसके बावजूद संबंधित कर्मचारी ने न केवल आवास पर कब्जा बनाए रखा, बल्कि पूरी जमीन को निजी संपत्ति में बदलने की तैयारी भी कर ली।


सबसे बड़ा आरोप राजस्व विभाग पर लग रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना राजस्व अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के शासकीय भूमि का पट्टा किसी निजी व्यक्ति या उसके परिजनों के नाम जारी होना संभव ही नहीं है। सवाल यह उठता है कि आखिर पट्टा जारी करते समय जमीन के रिकॉर्ड, खसरा और शासकीय अभिलेखों की जांच क्यों नहीं की गई।क्या संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, या फिर प्रभाव और दबाव में पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया गया।


ग्रामीणों और स्थानीय नागरिकों में इस मामले को लेकर हैरान है। लोगों का कहना है कि प्रशासन गरीबों और कमजोर वर्गों के खिलाफ तो तत्काल कार्रवाई करता है, लेकिन रसूखदारों और प्रभावशाली लोगों के सामने पूरी व्यवस्था घुटने टेक देती है। यदि कोई गरीब परिवार सड़क किनारे या शासकीय भूमि पर छोटी सी झोपड़ी भी बना ले, तो तहसील प्रशासन नोटिस लेकर पहुंच जाता है। मगर यहाँ एक सरकारी कर्मचारी ने शासकीय आवास पर कब्जा कर लिया और प्रशासन मौन बना हुआ है।


स्थानीय पत्रकारों और जागरूक नागरिकों ने भी इस मामले को कई बार उठाया। बताया जाता है कि तहसीलदार और संबंधित पटवारी को मौखिक रूप से साक्ष्य सहित जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद अब तक न तो किसी जांच समिति का गठन हुआ और न ही कथित अवैध पट्टे को निरस्त करने की कोई कार्रवाई प्रारंभ की गई। इससे यह आशंका और गहरा गई है कि मामला राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक सांठगांठ से जुड़ा हो सकता है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि संबंधित कर्मचारी का प्रभाव इतना बढ़ चुका है कि वह अन्य शासकीय भूमि पर भी अतिक्रमण को बढ़ावा दे रहा है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में अन्य लोग भी सरकारी जमीनों और भवनों पर कब्जा करने का साहस करने लगेंगे। इससे न केवल शासन को आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि सरकारी व्यवस्था भी पूरी तरह प्रभावित होगी।यह मामला केवल एक आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। यदि अधिकारी वर्ग के लिए निर्मित आवास ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो आने वाले समय में नए अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए ठहरने की व्यवस्था कैसे सुनिश्चित होगी सरकारी आवास का इस तरह निजीकरण होना शासन की नीतियों और कानून व्यवस्था दोनों के लिए खतरे की घंटी है।


कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शासकीय भूमि पर अवैध रूप से पट्टा जारी किया गया है, तो यह अनियमितता की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका की जांच आवश्यक होती है। यदि दस्तावेजों में हेरफेर या नियमों का उल्लंघन सिद्ध होता है, तो संबंधित अधिकारियों और लाभ लेने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही किया जाना चाहिए।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेता है।आमजन की मांग है कि तत्काल उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, संबंधित पट्टे को निरस्त किया जाए, शासकीय आवास को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए और दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई हो। क्योंकि यदि सरकारी संपत्तियों पर कब्जा करने वालों को संरक्षण मिलता रहा, तो आम जनता का प्रशासन और कानून व्यवस्था से विश्वास उठना तय है।


घुघरी का यह मामला प्रशासनिक तंत्र के उस चेहरे को उजागर करता है, जहाँ नियम और कानून आम लोगों के लिए तो सख्त हैं, लेकिन रसूखदारों के लिए व्यवस्था लचीली हो जाती है। अब आवश्यकता है निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई की, ताकि यह संदेश जाए कि सरकारी संपत्ति किसी की निजी जागीर नहीं है और कानून सबके लिए समान है।

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